प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमेशा अपने फैसले से चौंकाते रहे हैं। इस बार भी उन्होंने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का अप्रत्याशित फैसला ले सभी को चौंका दिया। देश के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने किसानों से क्षमा मांगते हुए तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला लिया। इस फैसले से गाजीपुर बार्ड़र के साथ ही दिल्ली स्थित बाकी सीमाओं पर भी आंदोलनरत किसानों में जश्न का माहौल था। किसानों ने यहां सभी को जलेबियां खिलाइ। वहीं विपक्ष ने प्रधानमंत्री के इस फैसले को जनता और किसानों की एकता की जीत बताया है। हालांकि किसान नेता राकेश टिकैत ने पीएम मोदी की अपील ठुकराते हुए ट्वीट किया कि आंदोलन तत्काल वापस नहीं होगा‚ हम उस दिन का इंतजार करेंगे जब कृषि कानूनों को संसद में रद्द किया जाएगा। सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के साथ–साथ किसानों के दूसरे मुद्दों पर भी बातचीत करे यानी एक बात तो साफ है कि किसानों का एक साल से चल रहा आंदोलन फिलहाल उसी गति और ऊर्जा से चलता रहेगा। देखना है कि २९ नवम्बर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार कैसे और कितनी जल्दी तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की विधायी प्रक्रिया शुरू करती है। अचानक से लिये गए इस फैसले का सबसे बड़़ा प्रभाव खेती–किसानी के अलावा सियासत पर भी पड़े़गा। कुछ ही महीने बाद देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश में इस कानून को लेकर सबसे ज्यादा विरोध देखा गया। लाजिमी है कि ये कानून वापस लेने के निर्णय का सबसे व्यापक असर इसी राज्य में देखा जाएगा। निश्चित रूप से विपक्ष को भाजपा पर आक्रामक होने का मौका मिलेगा। एक खास बात यही देखने वाली होगी कि किसान नेता राकेश टिकैत का आगे का सफर कैसा होगाॽ इसके अलावा‚ खेती के तौर–तरीकों पर इस कानून के रद्द होने का असर किस तरह का होगाॽ बात निकलेगी तो किसान संगठन करीब ७०० किसानों की अकाल मृत्यु को लेकर सरकार से किस तरह मुआवजे की रकम तय करेंगेॽ कुल मिलाकर प्रधानमंत्री के फैसले के बावजूद अभी काफी कुछ साफ होना बाकी है। सत्ता पक्ष भले इसे प्रधानमंत्री का मास्टर स्ट्रोक बताए किंतु इतना तो साफ है कि केंद्र सरकार किसानों को इस बिल का फायदा बताने में नाकाम रही।
क्या इस बार पास होगा परिसीमन बिल?
20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में एक बार फिर संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 यानी...







