पीएलए को हर हाल में अप्रैल वाली पोजिशन पर वापस जाना होगा…..

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जबसे सोमवार रात को गलवान घाटी में भारतीय सेना पर चीनी सैनिकों द्वारा धोखे से हमला किया गया है, तभी से सोशल मीडिया पर कई अफवाहें देखने को मिल रही हैं। यहां चौंकाने वाली बात ये है कि हमारे राष्ट्रीय स्तर के कुछ नेता भी इन अफवाहों को सच मान रहे हैं।

गुरुवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट किया: ‘चीन की हमारे निहत्थे सैनिकों को मारने की हिम्मत कैसे हुई? हमारे निहत्थे सैनिकों को शहादत के लिए क्यों भेजा गया?’ विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने इसके जवाब में ट्वीट किया: ‘हम तथ्यों को स्पष्ट कर दें। सीमा ड्यूटी पर सभी सैनिक हमेशा अपने पास हथियार रखते हैं, खासकर जब वे चौकी से बाहर निकलते हैं। जवानों ने 15 जून को गलवान में भी ऐसा किया था। लंबे समय से चले आ रहे चलन (1996 और 2005 के समझौतों के अनुसार) के चलते टकराव के दौरान फायरआर्म्स का इस्तेमाल नहीं किया जाता।’

सोशल मीडिया में ऐसी अफवाहें फैलाई गईं कि 35 से 40 जवान लापता हैं और शायद चीनी सेना ने उन्हें बंदी बना लिया है। भारतीय सेना ने जवाब दिया: ‘यह स्पष्ट किया गया है कि कोई भी भारतीय सैनिक कार्रवाई में गायब नहीं है।’ कुछ पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर कीलें जड़ी हुईं और जंग लगी लोहे की छड़ों की तस्वीरें पोस्ट की थीं और दावा किया था कि इनका इस्तेमाल चीनी सैनिकों ने हमारे जवानों पर किया था। सेना ने साफ किया कि चीनियों से ऐसा कोई हथियार बरामद नहीं हुआ है।

इस झड़प में जान गंवाने वाले सैनिकों के आंकड़ों पर सेना ने गुरुवार की शाम कहा कि इस घटना में 20 सैन्यकर्मी शहीद हुए हैं, और इस समय अस्पताल में भर्ती किसी भी जवान की हालत गंभीर नहीं है। लेह आर्मी हॉस्पिटल में इस समय 18 सैनिक भर्ती हैं, जो 15 दिनों के भीतर ड्यूटी पर वापस आ जाएंगे। अन्य बेस अस्पतालों में 58 सैनिक भर्ती हैं और वे भी एक सप्ताह के भीतर ड्यूटी पर लौट आएंगे। चीन के हमले में सेना के कुल 20 जवान शहीद हुए जबकि 76 घायल हुए हैं। एक तरफ हमारी सेना पूरी पारदर्शिता दिखा रही है, तो दूसरी तरफ चीन की सरकार अभी तक यह नहीं मान रही है कि झड़प में उसके 43 सैनिक मारे गए हैं और एक बड़ी संख्या घायलों की भी है।

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सोशल मीडिया पर बहुत सारी अफवाहें चल रही हैं और भारतीयों को चौकन्ना रहने की जरूरत है। ऐसी ही एक अफवाह में कहा गया कि LAC में तैनात हमारे जवानों के पास लद्दाख के ठंडे मौसम का सामना करने के लिए बॉडी सूट और स्नो बूट नहीं थे, और हालात खराब होने पर इन्हें मुंबई से भेजा गया। एक अफवाह यह भी थी कि चीनी सैनिक भारत के इलाके में 20 किलोमीटर (कुछ ने कहा कि 60 किमी) अंदर तक घुस आए और उस पर कब्जा कर लिया। इस तरह की सभी अफवाहें बेबुनियाद हैं। जमीनी हकीकत यह है कि हमारे सशस्त्र बल- सेना, नौसेना और वायु सेना- इस समय हमारी हवाई, जमीनी और समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं और किसी भी दुस्साहस का करारा जवाब दे सकती हैं। चीनी पहले से ही जानते हैं कि उन्होंने यदि आक्रामकता दिखाई तो ‘करारा’ जवाब मिलेगा।

सरकार अब राजनयिक और रणनीतिक मोर्चों पर सक्रिय है। एक तरफ चीन के साथ बातचीत चल रही है तो दूसरी तरफ जमीन पर हमारे सशस्त्र बलों ने अपनी निगरानी बढ़ा दी है। सेना और वायु सेना के राडार सीमा पर सक्रिय कर दिए गए हैं, फाइटर जेट और हेलीकॉप्टर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर नजर बनाए हुए हैं और नौसेना के युद्धपोतों को रणनीतिक स्थानों पर तैनात किया जा रहा है। LAC से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक, सभी जगहों पर लगातार आसमान से निगरानी की जा रही है, लड़ाकू हेलीकॉप्टर रेकी में जुट गए हैं, और चीनी सेना के सभी मूवमेंट्स पर ध्यान दिया जा रहा है।

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गुरुवार को चीनियों के साथ मेजर जनरल लेवल पर बातचीत हुई जिसे त्रिशूल डिवीजन के मेजर जनरल अभिजीत बापटा ने लीड किया। वार्ता सकारात्मक थी लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। मेजर जनरल बापटा के साथ ब्रिगेडियर ऑपरेशंस और कर्नल ऑपरेशंस के अलावा चाइनीज इंटरप्रिटर भी मौजूद थे। भारत ने चीनी हमले पर अपना कड़े शब्दों में विरोध दर्ज कराया है। भारतीय पक्ष ने साफ कर दिया है कि पीएलए को हर हाल में अप्रैल वाली पोजिशन पर वापस जाना होगा, इसके बाद ही हालात सामान्य हो सकते हैं। बातचीत जारी रहेगी।

LAC के पास काम का अनुभव रखने वाले सेना के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने राहुल गांधी के इस आरोप के बारे में बताया कि जब भी हमारे जवान एलएसी पर गश्त करने जाते हैं, वे कभी भी हथियारों के बिना नहीं जाते हैं, लेकिन भारत और चीन के बीच लंबे समय से एक समझौता है कि एलएसी पर किसी तरह की गोलीबारी नहीं की जाएगी। मुझे आश्चर्य है कि राहुल गांधी यह बात समझ क्यों नहीं पाए। अब शायद उनका सवाल यह हो कि यदि हमारे सैनिक गोली नहीं चला सकते तो वे कील जड़ी छड़ों और पत्थरों के साथ क्यों नहीं गए। खैर, दोनों तरफ से जवानों की जानें गई हैं। यदि हमारे 20 जवान शहीद हो गए, तो चीन ने भी अपने 43 सैनिक खो दिए। हमारे बहादुर सैनिकों ने यह कैसे किया? बेशक, उन्हें मुंहतोड़ जवाब देने की ट्रेनिंग मिली है।

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पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की टिप्पणी भी हैरान करती है । उन्होंने सवाल किया कि ऐसे नृशंस हमले के वक्त ‘हमारे जवानों को चीनियों पर गोली चलाने का आदेश क्यों नहीं दिया गया।‘ कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा, ‘अगर यूनिट के पास हथियार थे, जैसा कि अब दावा किया जा रहा है, तो यूनिट के उप कमांडर को उस वक्त गोली चलाने का आदेश देना चाहिये था जब कमांडिंग अधिकारी चीनियों के विश्वासघात के शिकार हुए।’ कैप्टन एक परिपक्व नेता हैं, वह सेना में रहे हैं, लेकिन उन्होंने सेना से तथ्यों की जांच नहीं की और टीवी चैनलों पर जो कुछ देखा, उसके आधार पर अपनी प्रतिक्रिया दे दी।

संकट की इस घड़ी में हमें दुनिया के सामने एकजुट दिखना चाहिए। पूरा देश, सरकार, और सभी राजनीतिक दल हमारी सेना के पीछे खड़े हों, क्योंकि यह इल्जाम लगाने का सही समय नहीं है। हमारे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में पूरे देश को मजबूती के साथ खड़ा होना चाहिए। उन्हें देशवासियों ने अपना सर्वोच्च नेता चुना है। प्रधानमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। तो आइए, संकट की इस घड़ी में हम एकजुट रहें।

देश को भरोसा है कि हमारी सेनाएं ताकतवर हैं, और दुनिया की महाशक्तियों में से एक का सामना करने की तैयारी चल रही है। भारत युद्ध नहीं चाहता, हम शांति चाहते हैं। पूरी दुनिया अब विश्वासघात के लिए जानी जाने वाली चीनी सेना के असली इरादे समझ गई है। यदि चीन बातचीत के रास्ते पर नहीं चलता है, और लद्दाख में अप्रैल की अपनी पुरानी पोजिशन पर वापस नहीं लौटता है, तो हमें चीनियों को उसी भाषा में जवाब देना होगा, जिसे वे बेहतर समझते हैं।

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