ज़िन्दा रिश्तों के शायर निदा फ़ाज़ली के चुनिंदा अशआर…

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निदा फ़ाज़ली तरक़्क़ी पसंद रिवायत का हिस्सा थे। उन्होंने अपनी शायरी में रूढ़िवादी परंपराओं से इंहराफ़ कर एहसासों को इस सलीक़े से अपने अशआर में पिरोया है कि उनकी शायरी जीवंत हो उठती है और भेदभाव ख़त्म हो जाते हैं। नज़रों के सामने एक समान आकृतियां उभरने लगती हैं। इसीलिए उन्हें अदब व शायरी में ज़िन्दा रिश्तों का शायर कहा जाता है। रिश्तों का ज़िक्र करते हैं तो उनके उतार-चढ़ाव, और नज़ाकतों को बयान करना नहीं भूलते।

आज उर्दू अदब के दुनिया के अलहदा सितारे निदा फाजली की जयंती है। निदा साहब का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ। वो बतौर शायर पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। उनका एक रूप गीतकार का भी रहा है। निदा साहब ने बॉलीवुड फिल्मों में तमाम हिट गाने लिखे जो कि आज तक लोग गुनगुनाते हैं।

निदा साहब का असली नाम मुक़्तदा हसन था। निदा फाजली उनका पेन नेम है। इसी नाम से निदा साहब को उनके चाहने वाले जानते हैं। उनकी लिखी गजलें और शायरी इसी नाम से मशहूर है। दरअसल निदा का मतलब ‘आवाज़’ होता है। यकीन हो लाखों-करोड़ों लोगों की आवाज थे। फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है। निदा साहब के पुरखे वहीं से आए थे। लिहाजा उन्होंने अपने नाम में फाजली जोड़ लिया। उनके जयंती पर पढ़िए उनकी लिखी ये दो बेहतरीन गजलें…

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कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

निदा साहब की लिखी एक और गजल पढ़ें….

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो

निदा साहब की लिखी फ़िल्म रजिया सुल्तान का यह गीत अमर कर गया …

ख़ुदा ख़ैर करे
आई ज़ंजीर की झनकार, ख़ुदा ख़ैर करे
दिल हुआ किसका गिरफ्तार, ख़ुदा ख़ैर करे
आई ज़ंजीर की…

जाने ये कौन मेरी रूह को छू कर ग़ुज़रा
एक क़यामत हुई बेदार, ख़ुदा ख़ैर करे

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लम्हा लम्हा मेरी आँखों में खिंची जाती है
एक चमकती हुई तलवार, ख़ुदा ख़ैर करे
दिल हुआ किसका…

ख़ून दिल का न छलक जाए मेरी आँखों से
हो न जाए कहीं इज़हार, ख़ुदा खैर करे

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