2019 में मोदी का विजय रथ रोकने को विपक्ष अपनाएगा फॉर्मूला 2004!

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अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में विपक्ष 2004 के मॉडल पर लड़ेगा. एनसीपी के महासचिव तारिक अनवर का कहना है कि 2004 के अनुभव पर ही ज्यादातर विपक्षी पार्टियां अगले लोकसभा चुनाव में उतरना चाहती हैं. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री पद के लिए किसी एक चेहरे को आगे बढ़ाए बिना भी नरेंद्र मोदी को हराया जा सकता है.

एनसीपी महासचिव और सांसद तारिक अनवर ने कहा कि विपक्षी पार्टियों में अनौपचारिक तौर पर सहमति है कि 2019 का लोकसभा चुनाव 2004 की तरह लड़ा जाए, यानी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी पार्टियां बीजेपी और मोदी के खिलाफ होते हुए भी राज्यों में गठबंधन अपने हिसाब से करें. इसका मतलब यह भी हुआ कि केरल में कांग्रेस और लेफ्ट एक दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में खम ठोकेंगे, लेकिन दूसरे राज्यों में साथ रह सकते हैं. इसी तरह पश्चिम बंगाल में लेफ्ट और टीएमसी आमने-सामने होंगी, लेकिन चुनाव के बाद एक साथ आ सकते हैं.

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2004 के चुनाव में क्या था विपक्ष का फॉर्मूला?
2004 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने बिना प्रधानमंत्री के चेहरे के चुनाव लड़ा था और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का कोई एक गठबंधन नहीं हुआ था. विपक्ष की दो पार्टियां कहीं एक साथ लड़ीं, तो कहीं आमने सामने भी, मसलन पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में कांग्रेस और लेफ्ट आमने-सामने थी तो कुछ राज्यों में एक साथ. चुनाव के बाद सभी विपक्षी पार्टियों के पास बहुमत की संख्या आने के बाद प्रधानमंत्री उम्मीदवार पर फैसला हुआ और बड़ी पार्टी होने के नाते कांग्रेस के प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर मनमोहन सिंह के नाम पर मुहर लगी.

फॉर्मूले पर क्या है विपक्ष की राय?
विपक्षी पार्टियों में एकजुटता की वकालत करने वाले शरद यादव भी एक तरह से तारिक अनवर की बातों का समर्थन करते दिखे. उन्होंने कहा, ‘तारिक अनवर की बातों में तथ्य भी है और दम भी, लेकिन विपक्ष को सरकार के खिलाफ मुद्दों पर आधारित आंदोलन खड़ा करना होगा’.

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वहीं कांग्रेस प्रवक्ता पीएल पुनिया का कहना है कि ‘महागठबंधन मीडिया की भाषा है. तारिक अनवर ने जो कहा है उसमें कोई विरोधाभास नहीं. बीजेपी को हराना ही गठबंधन का मकसद होगा. जैसी स्थिति होगी उसी हिसाब से गठबंधन होगा’.

तारिक अनवर से पहले टीएमसी की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इसी तरह का ‘वन टू वन’ फॉर्मूले की वकालत कर चुकी हैं. ममता के मुताबिक, जिस राज्य में जो पार्टी मजबूत है, उसके नेतृत्व में बीजेपी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरा जाए. इसके अलावा एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार भी राज्यों के आधार पर गठबंधन पर अपनी राय रख चुके हैं. लेकिन तारिक अनवर का बयान 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन को 2004 जैसा स्वरूप देने की वकालत करता है.

2004 के फार्मूले का कितना होगा असर?
2004 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठजोड़ के आगे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की ‘इंडिया शाइनिंग’ कैंपेन धराशाई हो गई थी. हालांकि बीजेपी का मानना है कि कोई भी गठबंधन मोदी सरकार को सत्ता वापसी से नहीं रोक सकता. विपक्ष चाहे राज्यों के स्तर पर गठबंधन करे या राष्ट्रीय स्तर पर, विपक्ष का मकसद मोदी सरकार को हटाना है. हालांकि 2019 के चुनावों से पहले विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी ये है कि वह 1977, 1989 या फिर 2004 की तुलना में बेहद कमजोर नजर आ रही है, वहीं सत्ताधारी बीजेपी बहुत ही मजबूत. देखना होगा कि क्या 2019 में सत्तापक्ष के खिलाफ विपक्ष का यह फॉर्मूला कितना कामयाब होगा…

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