सोनिया गांधी के सामने पार्टी के सम्मान, विश्वास और पीढ़ियों के अंतर के बीच वफादारी को स्थापित करने की चुनौती

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सोनिया गांधी ने करीब एक महीने पहले दूसरी बार कांग्रेस की बागडोर संभाली. कयासों और विकल्पों को खारिज करते हुए कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) ने उम्मीद जताई कि सोनिया पार्टी को पटरी पर ला सकती हैं. इस बात में कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी के अचानक इस्तीफा देने के बाद पार्टी में नेतृत्व का गंभीर संकट खड़ा हो गया.

सोनिया गांधी ने साल 1998 की चुनौतीपूर्ण परिस्तथियों में पद ग्रहण किया था. हालांकि लगातार दो लोकसभा चुनाव हारने के बाद अब उनके सामने पार्टी के सम्मान, विश्वास और पीढ़ियों के अंतर के बीच वफादारी को स्थापित करने की चुनौती है. अब यह देखना होगा कि क्या साल 2019 में कांग्रेस फिर से उठ खड़ी हो पाएगी, क्योंकि यह साल 1998 नहीं है.

कांग्रेस इस समय पुराने नेताओं और नए नेताओं के बीच लड़ाई, मतदाताओं से टूट चुका संपर्क, उत्साह की कमी, कंफ्यूज्ड पॉलिटिकल एजेंडा और नेतृत्व में विश्वास की कमी से जूझ रही है. इनसे निपटने के लिए कांग्रेस को वोट पकड़ने की जरूरत है, लेकिन गांधी अपना जादू खो चुके हैं.

सोनिया गांधी ने समस्याओं का समाधान करने की कोशिश की
गौरतलब है कि गुरुवार को पार्टी के शीर्ष अधिकारियों के साथ अपनी पहली बैठक में सोनिया गांधी ने पार्टी के सामने आने वाली इन समस्याओं का समाधान करने की कोशिश की. सबसे पहले उन्होंने अपनी रणनीति बताई, जिसमें मतदाताओं से जुड़ने के लिए बड़े पैमाने पर जनसंपर्क अभियान शुरू करना शामिल है. कांग्रेस को अब पता चला है कि उसका संपर्क जनता से टूट गया है. इसने दलितों और ब्राह्मणों के परंपरागत वोट बैंक भी खो दिए हैं.

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दूसरा, सोनिया गांधी ने सदस्यता अभियान शुरू करने की योजना बनाई है. यह जरूरी है, क्योंकि कांग्रेस के केवल दो करोड़ सदस्य हैं, जबकि भाजपा 14 करोड़ पार कर चुकी है. हालांकि इसके साथ ही पार्टी के छिन्न-भिन्न होने की जांच भी होनी चाहिए.

तीसरा उनके पास ट्रेनिंग मॉड्यूल स्थापित करने की भी योजना है, जो युवाओं को ‘सच्चे राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता’ के बारे में प्रशिक्षित करेगी. सोनिया गांधी ने सेवा दल और युवा कांग्रेस जैसी इकाइयों को भी सक्रिय करने की बात की है, जो कांग्रेस का संदेश देश भर में फैलाएंगे.

चौथे चरण में आक्रामक रुख अपनाना शामिल है. इसके लिए सोनिया ने पार्टी कार्यकर्ताओं को नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) सरकार की विफलताओं को उजागर करने के लिए अगले महीने से सड़कों पर उतरने का निर्देश दिया. सोनिया ने कहा कि ‘हमें सड़कों पर, गांवों, कस्बों और शहरों में लड़ने के लिए निडर होकर खड़े होना चाहिए. मुद्दे चाहे वे आर्थिक हों या सामाजिक मारे पास ठोस आंदोलन का एजेंडा होना चाहिए.’

पांचवें चरण में उन्होंने चुनावी वादों के क्रियान्वयन पर कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों के साथ एक बैठक की और सरकार-पार्टी के बेहतर समन्वय के लिए सलाह दी. आखिर में उन्होंने पार्टी को एकजुट रहने की सलाह दी है.

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ये सभी महत्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन समस्या इसे लागू करने में है. इनमें से ज्यादातर के बारे में लंबे समय तक बात की गई है. पार्टी को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है लेकिन कोई सामंजस्य नहीं है.

पुराने और युवा नेताओं के बीच अविश्वास
यहां पुराने और युवा नेताओं के बीच अविश्वास सामने आता है. सोनिया गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से प्रमुख यह कलह है, क्योंकि दोनों पक्ष यथास्थिति से खुश नहीं हैं. पुराने नेता स्वाभाविक रूप से अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं और इसलिए बदलाव के लिए उत्सुक नहीं हैं. वे खुश हैं कि सोनिया गांधी फिर से वापस आ गई हैं.

कई लोगों को उम्मीद थी कि सोनिया गांधी की वापसी के बाद कांग्रेस एकजुट चेहरा बन जाएगी. पार्टी के प्रमुख युवा चेहरे जैसे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, और मिलिंद देवड़ा को लगता है कि पुराने नेता उनके अवसरों को रोक रहे हैं.

दिलचस्प बात यह है कि पुराने नेताओं को लगता है कि भले ही पर्दे के पीछे से, लेकिन राहुल गांधी अभी भी प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं. सैम पित्रोदा, सचिन राव और प्रवीण चक्रवर्ती पुराने रक्षक के अनुसार, रणनीतिकार बने रहे. यहां तक कि जयराम रमेश, शशि थरूर और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पीएम मोदी (Pm Modi) की नकार देने से कुछ हासिल नहीं हो रहा है.

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चुनावी राज्यों में आपसी मतभेद
तीन राज्यों महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में पार्टी अंदरून मतभेद से जूझ रही है. सोनिया गांधी को गुटबंदी का शिकार हरियाणा, मध्य प्रदेश और दिल्ली में पार्टी को फूट से बचाने के लिए शांतिदूत की भूमिका निभानी है. कांग्रेस तीनों राज्यों में भाजपा के हाथों हार सकती है. सोनिया गांधी के लिए छिन्न भिन्न हो रही राज्यों की इकाई भी चिंता का सबब है.

कांग्रेस के लिए आज की स्थिति में स्पष्टता की आवश्यकता है. पार्टी के पास मामलों को तूल देने और सभी मुद्दों पर अपनी लाइन तय करने के लिए मंथन सत्र होना चाहिए. वास्तव में, पचमढ़ी और शिमला के सम्मेलन ने पार्टी को कई मुद्दों पर खड़े होने में मदद की.

सोनिया गांधी के पास पार्टी को फिर से संगठित करने और पुनर्जीवित करने का अकल्पनीय काम है. हालाकि गांधियों पर यह दोष भी है कि उन्होंने बीते दो दशक में उन्होंने कांग्रेस की सेहत पर ध्यान नहीं दिया. कांग्रेस का एक दिन में गायब हो जाना बहुत बड़ी बात है.

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