सृजन व शिल्प के देव विश्वकर्मा की अश्विनी नक्षत्र में पूजा आज

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 कर्म, सृजन, वास्तु और शिल्प के देवता भगवान विश्वकर्मा की पूजा मंगलवार को धूमधाम से की जा रही है। मान्‍यता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा सृजन की ऊर्जा देता है, साथ ही कामकाज में आने वाली अड़चनों को दूर करता है। इस बार पूजा में आश्विन मास व अश्विनी नक्षत्र का दुर्लभ संयोग बना है। इस योग में विश्वकर्मा पूजा करने से रोजी-रोजगार, कारोबार, नौकरी-पेशा में उन्नति होती है। साथ ही इस दिन भगवान शिव की आराधना से उनकी विशेष अनुकंपा की प्राप्ति होगी।

जिसकी सम्पूर्ण सृष्टि और कर्म व्यापार है वह विश्वकर्मा है। सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी कर्म सृजनात्मक है, जिन कर्मो से जीव का जीवन संचालित होता है, उन सभी के मूल में विश्वकर्मा है। ऐसे में भगवान विश्वकर्मा का पूजन जहां प्रत्येक व्यक्ति को ऊर्जा देता है, वहीं कामकाज में आनी वाली सारी अड़चनों को दूर करता है। यह पर्व हर साल आज के दिन 17 सितम्बर को मनाया जाता है । इसी दिन निर्माण के देवता विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। विश्वकर्मा को देवशिल्पी यानी देवताओं के वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है ।पंडित राकेश झा शास्त्री ने पंचांगों के हवाले से बताया कि मंगलवार को आश्विन कृष्ण तृतीया को आश्विनी नक्षत्र में भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाएगी । इस बार पूजा में आश्विन मास व अश्विनी नक्षत्र का अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस योग में विश्वकर्मा की पूजा करने से रोजी-रोजगार, कारोबार, नौकरी-पेशा में उन्नति होती है। इसके साथ ही इस दिन भगवान शिव की आराधना से इनकी विशेष अनुकंपा की प्राप्ति होगी।निर्माण के देवता हैं भगवान विश्वकर्मापंडित झा ने कहा कि भगवान विश्वकर्मा ने सतयुग में स्वर्ग लोक, त्रेता युग में लंका, द्वापर में द्वारिका और कलियुग में हस्तिनापुर की रचना की। यहां तक कि सुदामापुरी का निर्माण भी उन्होंने ही किया। ऐसे में यह पूजा उन लोगों के ज्यादा महत्वपूर्ण है, जो कलाकार, बुनकर, शिल्पकार और व्यापारी हैं । इस दिन ज्यादातर कल-कारखाने बंद रहते हैं और लोग हर्षोल्लास के साथ भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते हैं। इस दिन भगवान विश्वकर्मा ने सृष्टि के रचयिता ब्रrा के सातवें धर्मपुत्र के रूप में जन्म लिया था।विश्वकर्मा पूजा का महत्वपंडित झा के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पकार, वास्तुशास्त्र का देवता, देवताओं का इंजीनियर और मशीन का देवता कहा जाता है। विष्णु पुराण में विश्वकर्मा को देव बढ़ई कहा गया है। विश्वकर्मा की पूजा करने से व्यापार में दिन-दूनी रात चौगुनी वृद्धि होती है। साथ ही माता लक्ष्मी के आगमन के आसार में भी वृद्धि होती है।विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्तसंक्रांति काल मुहूर्त : प्रात : 05.54 बजे से 12.00 बजे तक अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 11.20 बजे से 12.08 बजे तकगुली काल मुहूर्त : दोपहर 11.44 बजे से 01.16 बजे तक

राशि के अनुसार ऐसे करें बाबा विश्वकर्मा की पूजा
मेष- राशि का स्वामी मंगल उच्च का है, जिसके कारण पूजा आपके लिए विशेष शुभप्रद कही जाएगी। इस दिन को और शुभकारी बनाने हेतु केसरिया रंग का वस्त्र धारण कर पूजन करें।
वृष- इस दिन विश्कर्मा की पूजा-जप व पाठ के बाद कुबेर की 11 माला जप करें। इससे शनि का प्रकोप न्यून हो जाएगा।
मिथुन-  कलश स्थापना के लिए हरे रंग की रंगोली बनाएं। भगवान गणपति के शतनाम के पाठ के बाद विश्वकर्मा पूजन कर कदली का प्रसाद गरीबो में बाटें।
कर्क- यह वर्ष सभी प्रकार से कल्याणकारी परिणाम प्रदान करने वाला साबित होगा। आज भगवान शिव का आशीर्वाद विश्वकर्मा पूजन में प्राप्त करने के लिए गरीबों में सफेद अन्न का वितरण करें।
सिंह- स्नान करने के बाद भगवान भास्कर को जल अवश्य दें। जल में रोली, लाल फूल, व गुड़ डालना न भूलें। निश्चित तौर पर भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा मंगलकारी सिद्ध होगी।
कन्या- चंद्रमा, जो आप के लाभ का स्वामी है, सुख स्थान पर रहेगा। इसके कारण पूजा से आपके सभी मनोरथ सिद्ध होंगे और कामकाज में वृद्धि होगी। नया रोजगार प्रारंभ होगा।
तुला- राशि से पराक्रम भाव का शनि आप के सभी अवरोध को स्वत: समाप्त करने वाला कहा जायेगा। राशि से चतुर्थ मंगल यांत्रिक कार्यो, निर्माण यंत्र से विशेष लाभ देने वाला कहा जायेगा। विश्वकर्मा पूजन से आपको विशेष लाभ प्राप्त होगा।
वृश्चिक- आपके लिए यह विश्वकर्मा पूजा दिवस कार्यक्षेत्र में सफलता देने के साथ-साथ विदेश से संबंधित व्यवसाय में नए रास्ते खोलेगी। पूजा के समय कलश स्थापना लाल रंग की रंगोली पर करें और साबुत लाल मसूर गाय को खिलाएं।
धनु- पूजा के समय चंद्रमा आपकी राशि पर होगा व बृहस्पति राशि से लाभ भाव मे आकर पुरानी सभी बाधाओं को समाप्त करेगा। भगवान विश्वकर्मा की पूजा का विशेष लाभ पाने के लिए श्री गणेश, महादेव व गौरी को वस्त्र अर्पित करें।
मकर- बीते साल की कठिनाइयों और संघर्ष से मुक्ति पाने के लिए इस साल विधिवत विश्वकर्मा पूजा करें। साथ ही साथ यह भी सुनिश्चित करें कि पवित्र गायत्री मंत्र के साथ कल-कारखाने व सभी उपकरण की शुद्धि हो जाये।
कुम्भ- पूजन पर बैठने के लिए कुश की आसनी पर बैठने का प्रबंध करें तथा पारिजात के फूल को भगवान विश्वकर्मा को अवश्य अर्पित करें। इस प्रयोग से सभी नकारात्मक शक्तियां समाप्त हो जाएंगी।
मीन- विश्वकर्मा पूजा साधना-अराधना कर भगवान विश्वकर्मा के साथ-साथ श्री नारायण का आशीर्वाद अवश्य ग्रहण करें। बाधाएं दूर होंगी और शुभ परिणाम निकलेंगे।
विश्वकर्मा पूजा के शुभ मुहूर्त
संक्रांति काल मुहूर्त: प्रात: 05.54 बजे से 12.00 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11.20 बजे से 12.08 बजे तक
गुली काल मुहूर्त: दोपहर 11.44 बजे से 01.16 बजे तक

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