अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 10 जनवरी को, तीन जजों की बेंच करेगी सुनवाई

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योध्या विवाद पर सुनवाई टल गई है. अब तीन जजों की बेंच 10 जनवरी को इस मामले की सुनवाई करेगी. उसी दिन आगे की सुनवाई की रूपरेखा भी तय होगी. अभी तक बेंच में कौन तीन जज होंगे नाम तय नहीं हो पाया है. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजय किशन कौल की बेंच ने इस मामले पर आज अपना फैसला सुनाया है.

राम मंदिर को लेकर एक और नई याचिका दायर की गई थी आइटम नंबर 18 के तौर पर. इसमें हरिनाथ नाम के शख्स (मूल पक्षकार नहीं) ने तय समय सीमा में सुनवाई की मांग की थी. कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया. हालांकि CJI ने कहा- 10 तारीख को जो बेंच बैठेगी, वही मामले पर कोई आदेश देगी.

हाईकोर्ट ने इस विवाद में दायर चार दीवानी वाद पर अपने फैसले में 2.77 एकड़ भूमि का सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच समान रूप से बंटवारा करने का आदेश दिया था। शीर्ष अदालत ने पिछले साल 29 अक्टूबर को कहा था कि यह मामला जनवरी के प्रथम सप्ताह में उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध होगा जो इसकी सुनवाई का कार्यक्रम निर्धारित करेगी।

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बाद में अखिल भारत हिन्दू महासभा ने एक अर्जी दायर कर सुनवाई की तारीख पहले करने का अनुरोध किया था परंतु न्यायालय ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था। न्यायालय ने कहा था कि 29 अक्टूबर को ही इस मामले की सुनवाई के बारे में आदेश पारित किया जा चुका है। हिन्दू महासभा इस मामले में मूल वादकारियों में से एक एम सिद्दीक के वारिसों द्वारा दायर अपील में एक प्रतिवादी है।

इससे पहले, 27 सितंबर, 2018 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत से 1994 के एक फैसले में की गई टिप्पणी पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास नए सिरे से विचार के लिए भेजने से इंकार कर दिया था। इस फैसले में टिप्पणी की गई थी कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।

अयोध्या प्रकरण की सुनवाई के दौरान एक अपीलकर्ता के वकील ने 1994 के फैसले में की गई इस टिप्पणी के मुद्दे को उठाया था। अनेक हिन्दु संगठन विवादित स्थल पर राम मंदिर का यथाशीघ्र निर्माण करने के लिये अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं।

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इस बीच, शीर्ष अदालत में शुक्रवार को होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को ही कहा था कि अयोध्या में राम मंदिर के मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अध्यादेश लाने के बारे में निर्णय का सवाल उठेगा।

8 साल से लंबित है मामला
30 सितंबर 2010 को इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया था. हाईकोर्ट ने विवादित जगह पर मस्ज़िद से पहले हिन्दू मंदिर होने की बात मानी थी. लेकिन ज़मीन को रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बांटने का आदेश दे दिया था. इसके खिलाफ सभी पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. तब से ये मामला लंबित है.

मामले में देरी को देखते हुए आरएसएस, शिवसेना, वीएचपी और संत समाज के एक वर्ग ने कानून लाने की मांग की है. हालांकि सरकार का कहना है कि हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का इंतजार करना चाहिए. पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अध्यादेश की मांग को खारिज कर दिया था. उन्होंने कहा था, “राम मंदिर पर हमारी सरकार अध्यादेश नहीं लाएगी. कानूनी प्रक्रिया के बाद ही राम मंदिर पर फैसला किया जाएगा. राम मंदिर को लेकर जब तक कानूनी प्रक्रिया चल रही है तब तक अध्यादेश लाने का विचार नहीं है.”

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