सांस्कृतिक सत्ताओं से साक्षात्कार कराता है भिखारी ठाकुर का ‘‘गबरघिचोर’

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पटना। आजाद वतन, आजाद जुबां की थीम पर राजधानी के कालिदास रंगालय में ‘‘कोरस’ द्वारा आयोजित नाट्योत्सव के तीसरे और अंतिम दिन सर्वप्रथम ‘‘भगत सिंह की जिंदगी के आखिरी बारह घंटे’ की प्रस्तुति हुई। वरिष्ठ पत्रकार रेहान फजल के लेख पर आधारित इस नाटक का निर्देशन पटना के युवा नाट्य निर्देशक और साहित्यकार प्रभात झा ने किया है। शहीदे आजम भगत सिंह की जिंदगी के आखिरी बारह घंटों, फांसी का फंदा चूमने के पहले के ठीक 12 घंटों का वर्णन करता यह नाटक सिर्फ घटनाओं ही नहीं, बल्कि एक युवा कैसे भगत सिंह में बदल जाता है, इस परिघटना को बारीकी से दिखाता है।दूसरी नाट्य प्रस्तुति ‘‘गबरघिचोर’ थी। निर्देशक थे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित और अपने काम की गहनता से दर्शक समुदाय का ध्यान खींचने वाले युवा निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन। भोजपुरी के नामी कवि-नाटककार भिखारी ठाकुर का यह नाटक अभी भी प्रासंगिक है। ‘‘गबरघिचोर’ सामाजिक संरचना में स्त्री की जगह, महिला-पुरु ष संबंध और विभिन्न किस्म की सांस्कृतिक सत्ताओं से हमारा साक्षात्कार कराता है। अभिनय की दृष्टि से कलाकारों ने नाट्यकथा को दर्शकों के आगे जीवंत किया और अपने संगीत से मोहित। तीन दिवसीय नाट्योत्सव का समापन समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय के वक्तव्य से हुआ।

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