सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत है सोनपुर का पशु मेला

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सारण और वैशाली जिले की सीमा पर गंडक और गंगा के पवित्र संगम पर विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेले की अपनी महत्ता है। एक माह तक चलने वाले इस मेले में देश-दुनिया के लोग आते हैं। इसे आंचलिकता, परंपरा और मनोरंजन का अद्भुत संगम भी कहा जा सकता है। इस मेले की पहचान की बात करें तो पशु मेले के तौर पर यह एशिया का सबसे बड़ा मेला है। एक माह तक चलने वाले इस मेले की शुरुआत प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन से होती है। इस मेले की विशिष्टता ने पूरी दुनिया में बिहार को एक अलग पहचान दिलायी है। कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर गंगा-गंडक संगम और अन्य घाटों पर स्नान के लिए बड़ी संख्या में साधु-संत, महात्मा सहित धर्मावलंबी यहां पहुंचते हैं। यहां स्नान करने के बाद भक्त हरिहरनाथ मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। यह मेला सिर्फ उत्सवी माहौल लेकर ही नहीं आता है बल्कि धर्म और आध्यात्म को भी अपने में समाहित करने के लिए आता है। जहां ये दो नदियां संगम को परिभाषित करती हैं वहीं दोनों नदियां जिन-जिन संस्कृतियों को छूती हुई आती हैं, उनकी विशिष्टताओं का भी मेल यहां होता है। इसी वजह से हमारे देश में संगम स्थलों पर धार्मिक अनुष्ठान, आयोजन, सामूहिक स्नान की परंपरा है। इन्हीं परंपराओं में से एक है बिहार का ‘‘सोनपुर मेला’।सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य गंगा के पार से हाथियों और घोड़ों की खरीदारी के लिए यहां आया करते थे। उसी समय से यहां प्रतिवर्ष मेले का आयोजन होने लगा। लगभग 2500 वर्ष पहले से लोग पशुओं को खरीद-बिक्री करने और अदला-बदली करने के लिए यहां जुटते हैं। पुराण में प्रचलित एक कथा के अनुसार, इसी स्थान पर हाथियों के राजा गजेंद्र के प्राणों की रक्षा भगवान विष्णु ने मगरमच्छ से की थी। यहां के गंधर्व राजा ‘‘हुहु’ अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार वे किसी गंधर्व कन्या के साथ स्नान करने झील में गए और उन्माद-उन्माद में उनका पैर ऋषि को छू गया। ‘‘हुहु’ को इसका तनिक भी ध्यान नहीं रहा और वे कन्या से ठिठोली करते रहे। इससे ऋषि को क्रोध आ गया और उन्होंने राजा ‘‘हुहु’ को मगरमच्छ बन जाने का श्राप दे दिया। दूसरी तरफ, इसी स्थान पर मौजूद घने जंगलों में गजेंद्र रहा करते थे। वे बहुत ही कोमल स्वभाव वाले राजा इंद्रायमना थे। एक बार अगस्त्य मुनि का अंजाने में अपमान कर डाला। मुनि अपने ध्यान में लीन थे, तभी राजा इंद्रायमना उनके आश्रम में पहुंचे पर वे उन्हें पहचान नहीं पाए। इस कारण महर्षि अगस्त्य ने राजा को श्राप देकर हाथी बना दिया। बाद में वे हाथियों के झुंड के राजा बन गए। एक दिन जब गजेंद्र पानी पीने के लिए गंडक नदी पर गए तो अचानक उन पर एक मगरमच्छ ने हमला कर दिया। इन दोनों महान राजाओं के बीच बिना हार-जीत के कई वर्षो तक युद्ध चला। हाथियों के राजा गजेंद्र ने भगवान विष्णु ‘‘हरि’ से मदद के लिए गुहार लगायी। भगवान ने प्रकट होकर मगरमच्छ का अपने चक्र से वद्ध कर उसे श्राप मुक्त कर दिए। उसी समय से इस क्षेत्र में आयोजित इस मेले को हरिहर नाथ मेला भी कहा जाने लगा। यहां स्थित हरिहर नाथ मंदिर के गर्भ गृह में भगवान विष्णु (हरि) की प्रतिमा एवं भगवान शिव (शिव)का लिंग स्थापित है। यह भी एक वजह है कि इस पूरे क्षेत्र को हरिहर क्षेत्र कहा जाता है। हरिहर नाथ मंदिर में भगवान राम से जुड़े कई चिह्न सर्वत्र मौजूद हैं। बेहतरीन वास्तुशिल्प वाले इस मंदिर का निर्माण राजा रामनारायण ने मुगलकाल के दौरान कराया था। कुछ समय पहले बिड़ला ने इसका निर्माण करवाया था। ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व वाले हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेले को अंतरराष्ट्रीय पटल पर पहुंचाने के लिए राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है। पशुओं के क्रय-विक्रय और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध इस मेले में पिछले वर्ष की तुलना में पर्यटकों की संख्या में इजाफा हो रहा है। सैलानियों के मनोरंजन के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम, विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने के लिए स्विस कॉटेज बनाए जाते हैं। मेले की लोकप्रियता को देखते हुए यहां कई ब्रांडेड कंपनियां भी अपना स्टॉल लगाने लगीं हैं। स्थानीय और पूरे राज्य की काश्तकारी, हस्तशिल्प और हथकरघा वाले उत्पादों के अलावा यहां गुजरात, हरियाणा, यूपी, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर समेत अन्य राज्यों के व्यापारी भी यहां आते हैं। सोनपुर मेला क्षेत्र राजधानी पटना से उत्तर दिशा में गंगा के उस पार लगभग 25 किमी की दूरी पर स्थित है। स्थानीय कलाकारों के अलावे देश के नामी-गिरामी कलाकारों को शिरकत करने और अपनी कला का प्रदर्शन करने का मौका तो मिलता ही है मेले में आए लोगों का मनोरंजन भी हो जाता है।

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