शेषन की शेष कथा

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तिरुनैले नारायण अय्यर शेषन यानी टी.एन. शेषन। आज इस नाम से बहुत लोग परिचित नहीं होंगे, लेकिन नब्बे के दशक में शायद ही कोई इस नाम को न जानता हो। मुख्य चुनाव आयुक्त रहते शेषन को देशभर में उनके चुनाव सुधार के लिए जाना जाता है। चुनाव में ‘‘पहचान पत्र व्यवस्था’ लागू करने वाला यह शख्स आज तमिलनाडु के वृद्धाश्रम में गुमनाम सी जिंदगी जी रहा है। कभी अखबारों के पहले पन्ने पर छाए रहने वाले शेषन की वृद्धा आश्रम में जिंदगी काटने की बात छोटे सी खबर के माध्यम से पता चलती है। खबर के मुताबिक शेषन सत्य साई बाबा के भक्त थे। उनके निधन के बाद वो सदमे में आ गए। उन्हें चेन्नई के एक वृद्धाश्रम में भर्ती कराया गया। तीन साल रहने के बाद वो फिर से अपने घर चले गए, लेकिन भूलने की बीमारी की वजह से शेषन को रिश्तेदार वापस वृद्धाश्रम ले आए। निसंतान शेषन के साथ उनकी पत्नी भी हैं। कुछ वक्त के लिए थोड़े आदर्शवादी बनकर हम शेषन के नजदीकी या रिश्तेदारों को कोस सकते हैं। क्योंकि भारत में पश्चिम के ‘‘ओल्ड एज होम’ यानी वृद्धाश्रम की परिकल्पना नहीं है। इसे हमारा समाज अपने आदर्शवादी नजरिए से आज भी स्वीकार नहीं करता। लेकिन स्व केंद्रित या कहें स्वार्थी होते समाज के ‘‘ओल्ड एज होम’ आज जिंदगी की हकीकत बनते जा रहे हैं। संयुक्त परिवार की परम्परा समय की मुट्ठी में रेत के माफिक फिसलती जा रही है। लेकिन थोड़ा यथार्थवादी होकर सोचें तो, ऐसे भी लोग हैं जिनकी संताने हैं इसके बावजूद वो जीवन के ढलान पर वृद्धाश्रम में हैं। अनुमानत: कहा जा सकता है कि शेषन ने संबंधों के अलावा सब कुछ कमाया। मगर सामाजिकता के निवेश में वो चूक गए। बहुत कुछ करने-पाने की आपाधापी में रिश्तों के ताने-बाने की ऊष्मा को कायम नहीं रख पाए, जिसकी कीमत चुका रहे हैं। हो सकता है यह टिप्पणी थोड़ी रु खी लगे। लेकिन उच्च पदों पर आसीन लोग अपने ही आभामंडल के चक्रव्यूह में फंस रह जाते हैं। लेकिन ऐसी और कहानियों के लिए हमें तैयार रहना होगा क्योंकि आज का वक्त अपना तेवर बदले हुए है।

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