शिक्षकों की लड़ाई पर यूं लगा विराम

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्य के नियोजित शिक्षकों लड़ाई पर विराम लग गया। अब उन्हें सरकार के रहमोकरम पर निर्भर रहना होगा। कल तक अपने विरोध-प्रदर्शन कर सरकार को डराने वाले शिक्षकों के पास अब कोई विकल्प नहीं रह गया है। शिक्षक खुद को दिलासा दिलाने के लिए पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की बात कह रहे हैं। हालांकि शिशा मंत्री कृष्णनंदन वर्मा ने सरकार को शिक्षकों का हितैषी बताकर मलहम लगाने की कोशिश जरूर की है। उधर विपक्षी दलों द्वारा भी शिक्षकों के पक्ष में खड़ा होकर उनकी सहानुभूति बटोरने का खेल आरंभ हो गया है। राज्य में डिग्री लाओ नौकरी पाओ की तर्ज पर शिक्षकों की नियुक्ति की गयी थी। तब नियोजित शिक्षकों ने मान लिया था कि आज न कल समान वेतन मिलेगा ही। इस कारण शिक्षक दस साल से यह लड़ाई लड़ते आ रहे हैं। 2009 में बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ ने नियोजित शिक्षकों के लिए समान काम समान वेतन की मांग पर एक याचिका पटना हाइकोर्ट में दाखिल की थी। आठ साल तक चली लंबी सुनवाई के बाद पटना हाइकोर्ट ने 2017 को फैसला बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के पक्ष में दिया था। इसमें कहा गया था कि नियोजित शिक्षकों को समान काम के लिए समान वेतन मिलना चाहिए। पटना हाईकोर्ट के इस फैसले के विरोध में बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई थी। यह भी सच है कि बिहार में नियोजित शिक्षकों की सैलरी आम टीचरों के मुकाबले बेहद कम है। साल 2004 में पहली बार बिहार सरकार ने शिक्षामित्र के नाम से टीचरों की बहाली की थी। उस वक्त इनकी सैलरी सिर्फ 1500 रुपये थी। बाद में सरकार कुछ साल के अंतराल पर सैलरी बढ़ती रही। साल 2006 तक ग्रैजुएशन और इंटरमीडिएट की मार्कशीट पर लोगों को नौकरी मिलती थी। 2012 के बाद नियोजित शिक्षकों की बहाली शिक्षक पात्रता परीक्षा के आधार पर होने लगी लेकिन सैलरी में इजाफा नहीं हुआ। अब शिक्षक संगठन कह रहे हैं कि समान वेतन हासिल करने के लिए अब सड़क पर उतरकर नीतीश सरकार के खिलाफ चरणबद्ध तरीके से आक्रोशपूर्ण आंदोलन भी करेंगे। समान काम के लिए समान वेतन बिहार के नियोजित शिक्षकों का संवैधानिक अधिकार है जिसे नीतीश सरकार से हर कीमत पर हासिल किया जाएगा।

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‘‘समान काम, समान वेतन’मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुनाया और 31 अक्टूबर 2017 को उच्च न्यायालय के दिए गए फैसले को निरस्त करने के बाद बिहार के साढ़े तीन लाख से अधिक नियोजित शिक्षकों में शोक की लहर है और शिक्षकों ने इस फैसले से असहमती जताई है। पटना मंडल प्राथमिक शिक्षक संघ के सचिव प्रेमचंद्र ने उपरोक्त फैसले को दोषपूर्ण करार देते हुए कहा कि इसकी मूल प्रति का अध्ययन करने के बाद संघ की ओर से प्रतिक्रिया दी जाएगी लेकिन प्रथम दृष्टया यह शिक्षक हित में आया फैसला नहीं है जिससे सभी शिक्षक पीड़ित और प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं। बिहार में दो चरणों का चुनाव बाकी है हमारे परिजनों ने यह निर्णय लिया है इन दोनों चरणों में शिक्षक के परिजन एवं छात्र ‘‘नोटा’ का प्रयोग करेंगे। बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ के राज्य कार्यालय सचिव मनोज कुमार ने कहा कि बहुत ही जल्द उपरोक्त संदर्भ में बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ की राज्य स्तरीय बैठक बुलाई जाएगी जिसमें सारे शिक्षक एकमत होकर बड़ी लड़ाई का शंखनाद करेंगे जिसका खामियाजा सरकार को भुगतना पड़ेगा। वहीं परिवर्तनकारी प्रारम्भिक शिक्षक संघ के प्रदेश महासचिव आनंद कुमार मिश्रा और सचिव जयकांत धीरज ने कहा कि हमारी लड़ाई निरंकुश सत्ता से है और सभी न्यायिक बिंदुओं पर विचार करके आगे लड़ाई जारी रखी जाएगी। जल्द ही हम सरकार से हिसाब बराबर करेंगे। शिक्षक नेताओं ने कहा कि हर हाल में जीत बिहार के नियोजित शिक्षकों की होगी। अब सड़क से न्यायालय तक संघर्ष करेंगे शिक्षक टीईटी-एसटीईटी उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष मार्कण्डेय पाठक ने सुप्रीम कोर्ट कहा कि निर्णय का हम सम्मान करते हैं लेकिन संघ आदेश की कॉपी का अपने अधिवक्ता के माध्यम से गहन अध्ययन कर रही है और उसके बाद पुनर्विचार याचिका दायर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि बिहार सरकार ने गलत तयों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रभावित किया। संघ सड़क से लेकर न्यायालय तक संघर्ष करेगा। आज के फैसले से यह पूर्णत: सत्य लग रहा है कि सरकार के तीनों अंग- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक दूसरे की रक्षा करने के लिए ही हैं। आज 10 मई 2019 के दिन ने 10 मई 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की याद को ताजा कर दिया है जिसे उस समय के गोरे शासकों (वर्तमान की नीतीश सरकार) ने कुचल दिया। आज उसी की पुनरावृत्ति हुई है। लेकिन इस से न्याय पाने की हमारी भूख समाप्त नहीं होगी बल्कि और मजबूती के साथ सड़क से लेकर न्यायालय तक हमारा संघर्ष तेज होगा।

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