शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को दी गई महासमाधि

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श्री कांची कामकोटि पीठ के 69वें शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को धार्मिक संस्‍कार पूरी होने उपरांत वृंदावन एनेक्सी में महासमाधि दी गई. बुधवार को 82 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया. सुबह सात बजे धार्मिक संस्‍कार शुरू हुई. पहले अभिषेक किया गया उसके बाद आरती. देश भर से वैदिक पंडित सभी चार वेदों से मंत्रों का उच्चारण किया. उसके बाद विशेष पूजन भी किया गया.

धार्मिक संस्‍कार पूरी होने के बाद शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती के पार्थिव शरीर को मुख्य हॉल से निकालकर वृंदावन एनेक्सी ले जाया गया. बेंत की एक बड़ी टोकरी में शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती के पार्थिव शरीर को बैठी हुई मुद्रा में डालकर सात फुट लंबे और सात फुट चौड़े गड्ढे में नीचे उतारा गया और उसके ऊपर शालिग्राम रखा गया.

गड्ढे को जड़ी बूटी, नमक और चंदन की लकड़ी से भर दिया गया. बाद में कबालमोक्षम ( जिसमें सिर पर नारियल रखकर उसे प्रतिकात्मक रूप से तोड़ा जाता है) किया गया. समाधि संस्कार पूर्वाह्न ग्यारह बजे पूरी हुई. महासमाधि के दौरान मठ परिसर के आसपास सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गयी थी.

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सुबह तमिलनाडु के राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित ने कांची मठ के शंकराचार्य को श्रद्धांजलि दी. लाखों की संख्‍या में लोगों ने शंकराचार्य का अंतिम दर्शन किया.

* विजयेंद्र सरस्वती होंगे नये शंकराचार्य

श्री कांची कामकोटि पीठ के 69वें शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती का दिल का दौरा पड़ने के बाद बुधवार को निधन हो गया. सुबह 82 वर्षीय शंकराचार्य को बैचेनी की शिकायत के बाद एक निजी अस्पताल ले जाया गया.

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठ के वरिष्ठ पीठाधिपति जयेंद्र सरस्वती दिवंगत श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती स्वामीगल के बाद इस शैव मठ के प्रमुख बने थे. जयेंद्र सरस्वती का स्थान कनिष्ठ पीठाधिपति विजयेंद्र सरस्वती लेंगे.

* जयेंद्र सरस्वती के नाम के साथ प्रतिष्ठा और विवाद दोनो जुड़े थे

जयेंद्र सरस्वती अपने समय के सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक नेताओं में से एक थे. जयेंद्र सरस्वती मठ के 69वें शंकराचार्य थे। इस मठ के बारे में माना जाता है कि इसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने करीब 2500 वर्ष पहले स्वयं की थी.

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जयेंद्र सरस्वती के नाम के साथ प्रतिष्ठा और विवाद दोनो जुड़े़ क्योंकि 2004 में एक मंदिर के प्रबंधक की हत्या के मामले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. हालांकि बाद में एक सत्र अदालत ने उन्हें और उनके कनिष्ठ विजयेंद्र सरस्वती एवं अन्य को इस मामले में बरी कर दिया था.

जयेंद्र सरस्वती को सामाजिक कार्यक्रमों की पहुंच आम आदमी तक ले जाने का श्रेय दिया जाता है. भारत में हिंदू धर्म को प्रभावित करने वाले मामलों में उनका काफी प्रभाव था जिसमें अयोध्या मामला भी शामिल था.

दिवंगत श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती के बाद जयेंद्र सरस्वती 1994 से इस मठ का नेतृत्व कर रहे थे. शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने 1987 में उस समय विवाद उत्पन्न कर दिया था जब वह मठ से लापता हो गए थे. 17 दिन बाद वह वापस आये थे और तब हजारों श्रद्धालुओं ने उनका स्वागत किया था. उन्होंने तब अपना सामाजिक संगठन जन कल्याण शुरू किया था. जयेंद्र सरस्वती को दिवंगत मुख्यमंत्री जे जयललिता का नजदीकी माना जाता था.

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