वैलेंटाइन डे’ पर लव गुरु मटुक नाथ का युवाओं के नाम संदेश!

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प्यारे युवा मित्रो! वेलेंटाइन डे की पूर्व संध्या पर आप सबों का हार्दिक अभिनंदन है. इस मधुर वेला में मैं आप लोगों की प्रेम संबंधी समस्याओं पर विचार रखने के लिए अत्यंत उत्साहित हूँ. जो केवल उम्र से युवा हैं, जिनके भीतर कोई उत्साह नहीं, जिनके पास अपने सपनों को साकार करने के लिए संघर्ष की शक्ति नहीं, जो बुझे-बुझे से जीवन खेप रहे हैं, उन्हें मैं युवा नहीं कह पाऊँगा. जो कुछ सीखने के लिए और कुछ पाने के लिए बेताब हैं, वही युवा हैं. जो ऊर्जा के भंडार हैं, वही युवा हैं.

यही ऊर्जा उत्साह और उमंग बनती है. यही ऊर्जा स्वप्न देखती है और उसे पूरा करने के लिए जी-जान लगा देती है. यही ऊर्जा साहस बनती है और कड़े मुकाबले में उतरकर मनचाही चीज हासिल करती है. ऐसे ही अहर्निश ऊर्जा की उमड़न में मचलते रहने वाले युवाओं की कुछ उन समस्याओं पर विचार करना चाहता हूँ, जिनसे प्रायः वे पीड़ित रहते हैं. अनेक युवा अक्सर मुझसे पूछते हैं –

कभी-कभी तो कुछ युवक ज्यादा ही निराश हो जाते हैं और पुरुष-जीवन को ही धिक्कारने लगते हैं और स्त्री-जीवन को स्पृहणीय मान लेते हैं. वे कहते हैं –

मैंने सोचा, जरा लड़कियों से पूछूँ! उनका क्या ख्याल है, इस बारे में? मालूम हुआ कि उनकी स्थिति भी अच्छी नहीं है. कुछ ने तो लड़कों से भी बदतर बताया.

“क्यों भई, तुम्हारे पीछे तो लड़के दीवाने हैं! बड़ी भाग्यशालिनी हो!”

“मत पूछिये सर, सभी मतलबी हैं. एक भी सच्चा प्रेमी नहीं. उन्हें तो बस चाहिए मेरा शरीर जल्दी से जल्दी और जरा-सी छूट दो तो वह भोगेगा और भागेगा. हमलोगों का जीवन भी एक सच्चे प्रेमी के इंतजार में सूना पड़ा है.”

अजीब बात है! दोनों दुखी हैं! लड़के ही नहीं, लड़कियाँ भी! दोनों मौजूद हैं, आस-पास हैं और प्यासे हैं! कबीर ठीक कहते हैं –

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‘पानी बिच मीन पियासी, मोहि सुनि-सुनि आवत हाँसी.’

मछली जल में है और प्यासी है! आखिर यह विडंबना कैसे घटित हो गई? कारण स्पष्ट है, दोनों को एक-दूसरे से प्रेम पाने का इंतजार है, मगर देने के लिए कोई राजी नहीं. दोनों भिखमंगे बन गए हैं! भिखमंगों की बस्ती में कौन किसको दान दे! बड़ी भूल हो गई – जबर्दस्त भूल! जो चीज देने की है, वही माँगी जा रही है! प्रेम तो प्रतिदान है. वह आपके ही प्रेम की प्रतिध्वनि है! आप जो देंगे, वही लौटेगा. अगर युवा साथी प्रेम की माँग को दान में बदल सके, तो एक क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है – दुख सुख में बदल सकता है.

आज एक प्रयोग करें – पहले एक दिन के लिए ही करें. प्रेम लुटाना शुरु कर दें और इसे लुटाने में कोई चुनाव नहीं, कोई भेद-भाव नहीं. जो सामने हो, सुलभ हो, उसी पर प्रेम उझल दें. सड़कों पर, मैदानों में बच्चे खेल रहे हैं, उनपर प्रेम की बरसा कर दें. जिसपर नजर पड़ जाय, प्यार भरी आँखों से देखें. स्त्री-पुरुष का भेद न रखें. सजीव-निर्जीव का भेद भी भूल जायँ. आप किताब के पन्ने भी पलटें तो प्रेम से, जो भी काम करें प्रेम से. उठें प्रेम से, बैठें प्रेम से, चलें प्रेम से, बतियायें प्रेम से. आप महसूस करेंगे कि आपके हृदय की कली चटकनी शुरु हो गई! आपके हृदय में प्रेम की हिलोरें उठने लगीं. उन हिलोरों में चुंबकीय आकर्षण है. वे चारों दिशाओं से प्रेम खींचने लगती हैं. आप पर प्रेम का मेघ बरसने लगेगा. हृदय प्रेम-जल से लबालब भर जायेगा! शुष्क रेगिस्तान सरीखे हृदय की तरफ कौन झांकता है!

चमक निगाहों में थी, जो किसी के आने से जगी. अपने ही दिल के सोये तार किसी ने छेड़े और संगीत निकल पड़ा. जैसे मिट्टी के नीचे जल है, कुदाल आदि केवल ऊपर से मिट्टी हटा देती है और जल-स्रोत प्रकट हो जाता है. इसी तरह प्रेमी और प्रेमिका एक-दूसरे के लिए कुदाल का काम करते हैं. लेकिन हम हैं कि कुदाल को ही कुआँ समझ लेने की भूल कर बैठते हैं! प्रेम और आनंद हमारे हृदय में उठता है और यह अन्य स्रोतों से भी उठाया जा सकता है. मूल सवाल एक है कि कैसे हमारे हृदय में आनंद की तरंगें उठें. सारा रस उन तरंगों में है.

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यह तो बात हुई, जिन्हें प्रेम नहीं मिलता है, उनके लिए कि कैसे वे प्रेमपूरित हों. लेकिन जिन्हें प्रेम मिला है, उनका क्या हाल है? अचरज की बात कि उनके सामने प्रेम न मिलनेवालों से भी बड़े दुख आन पड़े हैं. प्रेम पानेवाले युवा दो प्रकार की समस्याओं से ग्रस्त पाये जाते हैं. या तो उनका मीठा प्रेम कुछ ही दिनों में खट्टा हो जाता है, खट्टा ही नहीं, विषाक्त भी हो जाता है या शुष्क होकर निष्प्राण हो जाता है.

जिस स्त्री या पुरुष को पाने के बाद उसने सोचा था कि जीवन में स्वर्ग उतर आयेगा, वह स्वर्ग कहीं दूर ही अटक गया और उसकी जगह नरक हाजिर हो गया. कैसे हो जाता है यह? आप गौर से देखें तो पायेंगे कि प्रेम अपने उदय के साथ ही दो प्रकार के जहर लिए आता है. एक जहर है, अपने प्रिय पात्र पर कब्जा करने का भाव और दूसरा ईर्ष्या. वास्तव में ये एक ही चीज के दो रूप हैं. जिस स्त्री या पुरुष का हम अपने को मालिक समझने लगते हैं, उसे कोई छू दे, किसी दूसरे की ओर वह आकृष्ट होने लगे तो हम ईर्ष्या से जलने लगते हैं. सुनिये यह गीत –

तुम मुझे न चाहो तो कोई बात नहीं
किसी गैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी

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लेकिन सबका दिल कहाँ सँभल पाता है! ईर्ष्या हिंसा का रूप ले लेती है. वह कभी आत्महिंसा तो कभी परहिंसा में प्रकट होती है. प्रेमामृत की खोज में निकला आदमी कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है! प्रेम के इस भयावह रूप को देखकर ही समाज के लोग युवाओं को प्रेम-सागर में कूदने से मना करते हैं. लेकिन कूदोगे नहीं तो अमृत चखोगे कैसे? अमृत भी तो उसी सागर में है. इसलिए प्रेम में न पड़ना निदान नहीं है, निदान है प्रेम में डूबकर उसकी बुराइयों को निरंतर साफ करते रहना. उसे अनवरत निखारते रहना. उसे माँजने और निखारने का सबसे कारगर उपाय है ध्यान. मैं प्रेमियों को सलाह देना चाहता हूँ कि अगर वे प्रेम के साथ-साथ ध्यान को भी अपना सकें तो उनका प्रेम चमक उठेगा. लेकिन समस्या यह है कि ध्यान की सही समझ भी बहुत कम लोगों के पास है. अगर आप खोजी हैं तो सही ध्यानी आपको मिल जायेंगे. उनका सत्संग जरुरी है. ध्यान आपके संभोग को भी आत्म-निर्माण की दिशा सक्रिय कर देगा और आपका प्रेम नई -नई ऊँचाइयों में क्रीड़ा करने लगेगा. प्रेम एक महान् ऊर्जा है, ध्यान उसे दिशा देता है. ध्यान का मतलब है सजगता, जागरूकता. प्यारे मित्रो! मैं चाहता हूँ कि आपका जीवन प्रेम और ध्यान के मधुर मिलन से परिपूर्ण हो.

प्रेम अनंत है और इसकी समस्याएँ भी अनंत हैं. कुछ मूलभूत समस्याओं पर यहाँ विचार हुआ है, कुछ पर आगे कभी जब सुअवसर हाथ आयेगा तो किया जायेगा.

अंत में वेलेंटाइन डे की ढेर सारी शुभकामनाएँ. चलते-चलते कहते जाऊँ कि प्रेम विरोधियों पर दया कीजिएगा. उनके जीवन का सूनापन ही विरोध बनकर प्रकट हुआ है. उनकी पीड़ा को समझते हुए, देशकाल और अपनी परिस्थिति के अनुसार प्रेमोत्सव मनाइयेगा.

जय वेलेंटाइन डे! जय प्रेम-दिवस! जय भारत के युवा!

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