विरोधियों की रणनीति पर नमो की रणनीति भारी

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाले एनडीए की सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णो को दस फीसदी आरक्षण का विधेयक पारित कर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। ‘‘ नमो’ के इस ब्रह्मास्त्र से भाजपा समेत एनडीए ने भगदड़ मचे सवर्णो को अपने पक्ष में समेट लिया है वहीं कई फ्रंट पर विरोधी दलों की चुनावी रणनीति भोथड़ हो गई है।पिछले अजमेर समेत कई लोकसभा चुनावों में भाजपा के सारे प्रबंधन फेल हो गए थे। इसके बाद हाल के मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में भाजपा का किला ढह गया। ऐसे में भाजपा को सबसे पहले अपना दिल्ली का ‘‘ किला’ रक्षा करना चुनौती बनकर खड़ा हुई। ऐसे में भाजपा के रणनीतिकार मारक विरोधियों को शिकस्त देने के लिए मारक रणनीति बनाने के लिए बाध्य हुए। गरीबी, बेरोजगारी व लाचारी के बीच सवर्ण तबका भाजपा का परंपरागत मतदाता बना रहा और पिछले सत्तर वर्षो से उनके नाम कोई भी आकर्षक बात नहीं हुई जिससे वो इतरा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने एससी/एसटी के लिए मजबूत कानून बनाया। पिछड़े व अतिपिछड़े वगरे के लिए संवैधानिक आयोग का गठन कर उन्हें और मजबूती दी। अब मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम समय में आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णो को 10 फीसदी आरक्षण देकर कर्ज अदा किया। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान की हार के बाद भाजपा के समक्ष करो व मरो की स्थिति थी, किंतु इसने अपने एक ‘‘तीर’ से कई निशाने साध दिए। बिहार में भी हाल के चुनाव परिणाम में भाजपा की हार को देखते हुए भाजपा के परंपरागत वोट भटकाव शुरू हो गया था। अररिया लोकसभा उपचुनाव का मामला हो या जहानाबाद विधानसभा उपचुनाव का मामला, दोनों मामलों में एनडीए की हार में भाजपा के परंपरागत वोट ने थोड़ा-बहुत चोट अवश्य पहुंचायी थी। अलबत्ता हाल के राजस्थान व मध्यप्रदेश के चुनाव परिणाम को देखा जाए तो दो दर्जन से अधिक सीटों पर जीत का अंतर बहुत कम था। समझा जाता है कि यदि भाजपा के परंपरागत वोट नाराज नहीं होते तो इन दोनों स्थानों पर बाजी पलट सकती थी। मध्यप्रदेश में तो भाजपा अधिक मतप्रतिशत लेकर कांग्रेस से पिछड़ गई। केन्द्र सरकार के नये आरक्षण के कदम से भाजपा समेत उसके गठबंधन दल को भी खासा फायदा होने की उम्मीद बतायी जा रही है। भाजपा के परंपरागत वोट बैंक का एकमुश्त ट्रांसफर एनडीए घटक दलों को हो सकता है। विश्लेषकों की राय में जो मतदाता भाजपा के विरोधी दलों की तरफ आकर्षित हो रहे थे उनका आकर्षण अब थम जाएगा। राममंदिर का मामला भी मद्धिम हो गया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए ने प्रदेश की कुल 40 सीटों में 31 सीटें लाकर विरोधी दलों की हवा निकाल दी। इस चुनाव में भाजपा को 29.40 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि लोजपा को 6.40 प्रतिशत तथा रालोसपा को 3 प्रतिशत मत मिले थे। नयी परिस्थितियों में अब रालोसपा एनडीए के साथ नहीं है किंतु जदयू एनडीए पाले में आ गया है। रालोसपा समेत वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को करीब 39 प्रतिशत मत मिले थे। यदि रालोसपा का मत प्रतिशत हटा दिया जाए तो वर्ष 2014 में एनडीए का मत प्रतिशत 36 फीसदी बनता है, जबकि जदयू का 16 फीसदी मत प्रतिशत इसमें शामिल नहीं है। यदि आज के हालात में जदयू का मत प्रतिशत जोड़ दिया जाए तो एनडीए का मत प्रतिशत 52 फीसदी तक पहुंच जाता है। ध्यान रहे कि वर्ष 2014 के चुनाव में राजद को 15.80 प्रतिशत मत मिले थे और कांग्रेस को 8.40 प्रतिशत तथा एनसीपी को 1.20 प्रतिशत मत मिले। यदि ये तीनों दल चुनाव मिलकर लड़े तो इनका मत प्रतिशत करीब 25 प्रतिशत पहुंचता है। रालोसपा का तीन फीसदी व हम का एक फीसदी मत प्रतिशत इसमें जोड़ा जा सकता है। फिर भी यह मत प्रतिशत करीब 30 फीसदी तक ही पहुंच पाता है।

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