लालू की राजनीति

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आज  के दौर में देश की राजनीति में प्रताड़ित और साजिश का शिकार दिखने का चलन कुछ अजीब ढंग से बढ़ गया है। कमोबेश हर राजनैतिक दल और नेता को लोगों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए यही औजार सबसे कारगर लग रहा है। यहां तक कि चुनाव भी मान-अपमान और प्रतिशोध लेने की दुहाई देकर लड़े जाने लगे हैं। इसलिए राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और उनका दल अगर चारा घोटाले के एक मामले में सजा को अपने प्रति सहानुभूति जगाने का औजार बना रहे हैं तो कोई अचरज नहीं होता। यह भी समझ से बाहर नहीं है कि लगातार चुनावी हार झेल रहे विपक्षी दल भी इसे सत्तारूढ़ दल की साजिश के रूप में पेश करने की कोशिश करते दिख रहे हैं। अदालत के फैसले पर अलग राय हो सकती है और उसके खिलाफ ऊपरी अदालतों में अपील का भी प्रावधान है, लेकिन अगर अदालतों पर भी संदेह जाहिर किया जाने लगा तो इस पूरी व्यवस्था का होगा क्या? सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग की बातें नई नहीं हैं और यह भी कहा जा सकता है कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच-पड़ताल का सिलसिला इधर कुछ ज्यादा ही नजर आता है। लेकिन अदालती आदेशों पर भी राजनीति होने लगेगी तो निश्चित रूप से व्यवस्था में लोगों का भरोसा डिगने लगेगा। अदालतों को भी शायद अपनी आलोचनाओं पर नरमी बरतनी चाहिए। जहां तक राजनीति का सवाल है तो बिहार में बेशक ऊंचे दांव लगे हैं। कुछेक हलकों में र्चचा यह जरूर है कि लालू के सजायाफ्ता होने से राजद में बिखराव की संभावना बन सकती है, जिसका लाभ एनडीए खासकर नीतीश कुमार के जदयू को मिल सकता है। लेकिन यह दूर की कौड़ी है। राजद विधायकों की संख्या 80 है। दल-बदल के लिए न्यूनतम 60 विधायकों की दरकार है। लेकिन 80 में से 42 विधायक यादव और 12 मुसलमान हैं। सीधा हिसाब यह बैठता है कि माई समीकरण के विधायकों की सहमति के बिना टूट की बुनियाद नहीं पड़ सकती है। इसलिए यह गणित तो कोई कारण नहीं बनता। यानी लालू के लिए अपने को प्रताड़ित बताने की बड़ी वजह उनके दल की अंदरूनी राजनीति और बेटे तेजस्वी को लोकप्रियता दिलाने की कोशिश भी हो सकती है। लेकिन राजनीति का यह डगर वाकई समाज में ध्रुवीकरण और टकराहट ही पैदा करता है। और यह कोई एक दल नहीं, बल्कि हर ओर से हो रहा है। यह कतई शुभ नहीं कहा जा सकता।

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