राष्ट्रभाषा हिंदी को मिले राष्ट्र ध्वज-सा प्रेम और सम्मान

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SAHITYA SAMMELAN ME VISHV HINDI DIWAS SAMAROH

पटना। अपनी आंतरिक शक्तियों और सौंदर्य के कारण हिंदी समग्र संसार में फैल रही है। विदेशों में इसका कोई अवरोधक नहीं है। देश की अपेक्षा विदेशों में हिन्दी के विकास की गति अधिक तीव्र है। हिंदी के समक्ष जो बाधाएं हैं वह भारत में ही है और यह किसी और के कारण नहीं, उनके कारण से है जो अपने को हिंदी वाले कहते हैं। भारत में जिस दिन से राष्ट्रभाषा हिंदी को राष्ट्रीय ध्वज-सा भाव और सम्मान मिलने लगेगा, हिंदी उसी दिन संसार की प्रथम भाषा बन जाएगी। यह बातें बुधवार को यहां बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में ‘‘विश्व हिंदी दिवस’ के अवसर पर आयोजित समारोह एवं कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहीं। डा सुलभ ने कहा कि वर्ष 1975 की 10 जनवरी को नागपुर के वर्धा में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन में महान क्रांतिकारी संत विनोबा भावे ने कहा था कि, हिंदी में वे सारे तत्व मौजूद हैं जिनकी बदौलत वह विश्व की भाषा बन सकती है। उन्होंने कहा कि, हिंदी की आत्मा हमारे उस वैदिक विचारों में बसती है, जिसमें हमने ‘‘वसुधैव कुटुंबकम’ का उद्घोष किया। हिंदी में मनुष्यों को जोड़ने की अद्भुत क्षमता है, जिसके बल पर यह संपूर्ण भारत वर्ष को ही नहीं, एक दिन संपूर्ण वसुधा को भी एक करने में सफल होगी।समारोह का उद्घाटन करते हुए, मगध विविद्यालय के पूर्व कुलपति मेजर बलबीर सिंह भसीन ने कहा कि, हिंदी की देवनागरी लिपि, पंजाबी की गुरमुखी के अत्यंत निकट है, जैसे कि सगी बहने हों। इस अवसर पर, हैदराबाद से आए, भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति बीडी जत्ती द्वारा स्थापित संस्था ‘‘वासव समिति, हैदराबाद’ के अध्यक्ष जनार्दन पाटिल को ‘‘साहित्य सम्मेलन हिंदी सेवी सम्मान’ से सम्मानित किया गया। सम्मेलन के साहित्य मंत्री डा शिववंश पांडेय ने कहा कि, हिंदी के विकास में सबसे बड़ी बाध, भारत में इसका राज-काज की भाषा नहीं बन पाना ही है। जिस दिन यह बाधा दूर कर दी जाएगी, हिंदी को नए पंख लग जायेंगे। प्रो वासुकीनाथ झा, डा नागेश्वर प्रसाद यादव, कुमार अनुपम तथा चंद्रदीप प्रसाद ने भी अपने विचार व्यक्त किए।इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन में वरिष्ठ कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी ने इन पंक्तियों से हिंदी की महिमा का बखान किया कि, भाषा बहता नीर, हमारी हिंदी है/ स्वाभिमान प्राचीर, हमारी हिंदी है / इसमें गंगा – जमुनी संस्कृतियों की लय / जन-मन की आशा – अभिलाषा का संचय / साखी – सबद -कबीर, हमारी हिंदी है। कवि आचार्य आनंद किशोर शास्त्री ने कहा कि, हिंदी से है आजाद हिंद / यह आजादी की भाषा है / हिंदी मेरी पहचान, मुहर, हिंदी मेरी परिभाषा है। इस अवसर पर अन्य कवियों ने भी अपनी रचनाओं से कवि-सम्मेलन को यादगार बना दिया। मंच का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद – ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।राजभाषा संगोष्ठी आयोजितपटना। जगदम्बी प्रसाद यादव स्मृति प्रतिष्ठान एवं अंतरराष्ट्रीय हिन्दी परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में विश्व हिन्दी दिवस पर राजभाषा संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार सह विश्व हिन्दी सम्मेलन समन्वय समिति, विदेश मंत्रालय के सदस्य वीरेन्द्र कुमार यादव भी शामिल हुए। उन्होंने कहा कि हिन्दी को विश्व मंच पर आना है तो उसमें एक ऐसा रूतबा पैदा करना होगा, जो रौब और पावर की भाषा बन सके। कार्यक्रम में डॉ. शांति जैन, डॉ. मृगेन्द्र विक्रम, राजेन्द्र सिंह, डॉ. मधुबाला समेत बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।

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