राजनीतिक दल गठित करने के पक्ष में नहीं थे मार्क्‍स : गुप्ता

0
101

कार्ल मार्क्‍स की 200 वीं जयंती के मौके पर आद्री के तत्वावधान में पटना में शनिवार को कार्ल मार्क्‍स-जीवन, विचार, प्रभाव : द्विशतवार्षिकी पर एक आलोचनात्मक परीक्षण’ विषय पर आयोजित पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शुरू हुआ। पहले दिन पॉल एम स्वीजी स्मृति व्याख्यान देते हुए जेएनयू के पूर्व प्रो. दीपांकर गुप्ता ने साम्यवादियों द्वारा राजनीतिक दलों के गठन पर ही सवाल उठाया और विश्व कम्युनिस्ट पार्टियों को सवालों के घेरे में खड़ा किया। पार्टी के निर्माण की विडंबना को मुख्य रूप से सामने लाये। मार्क्‍स साम्यवादी घोषणा पत्र में न तो साम्यवादियों द्वारा राजनीतिक दलों के निर्माण के पक्ष में थे और न ही उन्होंने उनके तबकाई सिद्धांतों के निर्माण को स्वीकृति प्रदान की।प्रो. गुप्ता ने कहा कि अपने विचारों को अंजाम देने के लिए हिंसा की अवधरणा न तो मार्क्‍स ने प्रख्यापित की न प्रफेडरिक एंजेल्स ने। मार्क्‍स ने यह भी कहा था कि महिलाओं को सामाजिक क्रांति में केंद्रीय भूमिका निभानी चाहिए। मार्क्‍स ने वस्तुत: सामाजिक परिवर्तन में महिलाओं की अग्रणी भूमिका का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उन्होंने बीते समय में मार्क्‍स के विचारों की गलत व्याख्या पर दुख प्रकट किया। विद्वानों द्वारा स्टालिन, माओ, चाउसेस्कू और अन्य साम्यवादी तानाशाहों के साथ मार्क्‍सवाद के स्वत:स्फूर्त जुड़ाव की प्रवृत्ति को इसका कारण बताते हुए प्रो. गुप्ता ने बताया कि हन्ना आर्डेंट, मैक्स वेबर और मिल्टन प्रफीडमैन जैसे लोकप्रिय आलोचक अपनी आलोचनाओं से मार्क्‍सवाद को नुकसान पहुंचा रहे थे। हालांकि उनकी आलोचनाओं का बड़ा हिस्सा कमजोर तयों पर आधारित था। सम्मेलन का आयोजन डॉ.पीयुषेंदु गुप्ता और राधा कृष्ण चौधरी की स्मृति में किया जा रहा है जो 1967 में कार्ल मार्क्‍स पर 150वीं जयंती के अवसर पर बेगूसराय में राष्ट्रीय संगोष्ठी के मुख्य आयोजकों में थे। सम्मेलन का उद्घाटन डॉ.पीयुषेंदु गुप्ता की पुत्रवधु उषा सी गुप्ता और राधाकृष्ण चौधरी के पुत्र प्रणव कुमार चौधरी को अंगवस्त्र प्रदान करके सम्मानित करने के जरिये हुआ। आद्री की कोषाध्यक्ष डॉ.सुनीता लाल ने प्रशस्ति पत्र का वाचन किया और बाद में इस अवसर पर प्रमुख वक्ताओं को स्मृति चिन्ह भेंट किया।

यह भी पढ़े  ‘भाकपा की रैली से वाम व धर्मनिरपेक्ष दलों की एकता होगी सुदृढ़

जेएनयू के सेवानिवृत्त प्रोफेसर और दिल्ली विवविद्यालय के कुलपति प्रो. दीपक नैयर ने कहा कि भूमंडलीकरण संकट के दौर से गुजर रहा है। भूमंडलीकरण का उदय एक हजार ईसवी के बाद हुआ। भूमंडलीकरण बहुआयामी परिघटना थी जो वस्तुओं और सेवाओं तथा पूंजी के प्रवाह तक ही सीमित नहीं थी, इसका विस्तार विचारों, प्रौद्योगिकी और सूचनाओं के आदान-प्रदान तक भी रहा है। ऐतिहासिक रूप से वैश्वीकरण एक भंगुर प्रक्रिया रही है जिसमें समय-समय पर उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। प्रो. नैयर शनिवार को यहां कार्ल मार्क्‍स स्मारक व्याख्यान दे रहे थे। उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण लिए ऐसे वर्चस्व की जरूरत होती है जो विश्व व्यवस्था की सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित कर सके। अभी यह भूमिका संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा निभाई जा रही है। वर्ष 2008 के नियंतण्र आर्थिक संकट के दौरान वैश्वीकरण को यूरोपीय देशों के साथ-साथ अमेरिका में भी बड़ा धक्का लगा है जहां डोनाल्ड ट्रंप का उभार दिखा है। उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण का भविषय अंधकारमय है, लेकिन यह समाप्त नहीं होगा। भूमंडलीकरण की यह दुर्गति क्षेत्रीय राजनीति के कारण हुई है। अब कोई भी नेता अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बातें नहीं कर रहा है। नेता लोकलुभावन नारों और राष्ट्रवाद की बातें करने लगे हैं। इसका व्यापक असर भूमंडलीकरण पर पड़ा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के उदय से भूमंडलीकरण को बड़ा धक्का लगा है। पांच-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दक्षिण कोरिया के ग्योंगसांग राष्ट्रीय विविद्यालय के प्रो.स्योंगजिन ज्योंग ने रजनी पाम दत्त स्मारक व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए दक्षिण कोरिया में 1970 से 2014 के बीच हुए पूंजीवादी विकास के संबंध में मार्क्‍सवादी विचार प्रस्तुत किये। जेएनयू के पूर्व प्रो. सतीश जैन ने एडम स्मिथ स्मारक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने ‘‘मार्क्‍सवाद के मानकीय तत्व’ विषय पर अपने विचार रखे। ऑस्ट्रेलिया के सनाशइन कोस्ट विविद्यालय के वरिष्ठ व्याख्याता डॉ.शैनन ब्रिंकैट ने शापूरजी सकलातवाला स्मारक व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए ‘‘प्राचीन भारतीय द्वंद्वात्मकता और मार्क्‍स’ के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला।

यह भी पढ़े  भाजपा हराओ देश बचाओ रैली की तैयारी जोरों पर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here