राजधानी की सड़कों पर जाम बस्टर एजेंसी की मनमानी बंद

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पटना – अब राजधानी की सड़कों पर जाम बस्टर गाड़ियां नहीं उठायेगा। जाम बस्टर चलाने वाली एजेंसी पर कार्रवाई भी होगी। आईजी के आदेश पर गठित जांच टीम ने पाया कि एजेंसी को जाम बस्टर का काम देने में कई नियमों की धज्जियां उड़ाई गयी। जाम बस्टर के कर्मचारी मनमानी तरीके से गाड़ियों को उठाते थे और वाहन मालिकों से पैसे वसूलते थे। इससे सरकार को करोड़ों रुपये राजस्व की क्षति हुई। जांच टीम ने इस मामले में यातायात एसपी पीके दास को भी दोषी पाया है। लिहाजा जाम बस्टर एजेंसी और यातायात एसपी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए आईजी नय्यर हसनैन खान ने एसएसपी मनु महाराज को पंद्रह दिनों का वक्त दिया है। वहीं इस पूरे प्रकरण पर यातायात एसपी प्राणतोष कुमार दास ने कहा कि पटना का यह सिस्टम पूरे देश में सबसे पारदर्शी है। अभी तक जितनी भी गाड़ियां जाम बस्टर ने उठायी हैं, उसमें एक भी गलत नहीं है। नियमों के तहत कार्रवाई की गयी है जिसके साक्ष्य और सबूत भी मौजूद हैं। जहां तक कं पनी के साथ समझौते का सवाल है तो इसमें पूरी तरह से कानून का पालन किया गया है। इसमें वरीय अधिकारियों की भी सहमति है। सरकार को राजस्व का नुकसान नहीं हुआ है। इसके बाद भी अधिकारियों का जो भी आदेश और निर्देश होगा उसका पालन किया जायेगा।आईजी ने नवंबर में जाम बस्टर के खिलाफ शिकायत मिलने पर इसकी जांच के लिए एसएसपी के नेतृत्व में कमेटी बनायी थी। इसमें सिटी एसपी मध्य, सड़क परिवहन विभाग के अधिकारी, डीटीओ, यातायात डीएसपी, कमिश्नर के सचिव सहित अन्य पदाधिकारी शामिल थे। कमेटी ने शनिवार को इसकी रिपोर्ट आईजी को सौंप दी जिसमें जाम बस्टर एजेंसी और यातायात एसपी को दोषी पाया गया है। इसके बाद आईजी ने एसएसपी को पंद्रह दिनों के अंदर दोनों के खिलाफ कार्रवाई कर रिपोर्ट सौंपने के आदेश दिए हैं।

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जांच टीम की रिपोर्ट पर कार्रवाई :एसएसपी, डीआइजी और आइजी के पास लगातार इस बात की शिकायत मिल रही थी राजधानी में नो पार्किंग में खड़े वाहनों को टो-चेन करने के नाम पर जाम बस्टर एजेंसी मनमानी कर रही है। एजेंसी के कर्मी गुंडागर्दी कर रहे हैं। मनमानी ढंग से चालान वसूलते हैं। कई बार सफेद लाइन के अंदर रहने वाले वाहनों को भी उठा लिया जा रहा है। ऐसी दर्जनों शिकायतें सामने आने के बाद आइजी और आयुक्त के संयुक्त निर्देश पर पूरे मामले की जांच के लिए टीम गठित की गई। टीम में एसएसपी, सिटी एसपी, ट्रैफिक डीएसपी, आयुक्त के सचिव, एसडीओ सहित दो तकनीकी विशेषज्ञ शामिल थे। एसएसपी ने इस मामले में आम लोगों की राय जानने के लिए वाट्सएप नंबर भी जारी किया था। 15 दिन में जांच रिपोर्ट मांगी गई थी। जांच रिपोर्ट में इन सभी शिकायतों को सही पाया गया। कई अन्य अनियमितताएं भी सामने आई हैं।

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टेंडर में हुआ खेल, मालामाल हो गई एजेंसी: सूत्रों की मानें तो रिपोर्ट में नो पार्किग के नाम पर वाहन टो-चेन करने वाली एजेंसी को फायदा पहुंचाने का भी जिक्र है। बगैर कैबिनेट की मंजूरी के एक ही एजेंसी को तीन साल का अनुबंध मिल गया जबकि नियमानुसार सिर्फ 11 माह का टेंडर मिलना चाहिए था। ओपन टेंडर तो हुआ, लेकिन जनहित का ख्याल नहीं रखा गया। जिस जाम बस्टर एजेंसी को अनुबंधित किया गया, उसने एक बार में दो से तीन वाहनों के टो-चेन की बात कहकर अपना नुकसान गिना दिया लेकिन असलियत में एक बार में आधा दर्जन से अधिक बाइक टो-चेन किए गए।

जाम बस्टर वाहनों का फिटनेस टेस्ट भी नहीं चेक किया गया। 15 साल पार कर चुके वाहन से टो-चेन का काम चलता रहा। हैरानी की बात तो यह है कि ट्रैफिक एसपी भी इतने दिनों तक चुप रहे। ऐसे कई और सवाल खड़े हो रहे है।

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कार से 750 रुपये तो बाइक से वसूलते थे 445 रुपये : मोटर यान अधिनियम के तहत नो पार्किंग में खड़े वाहनों पर जहां सौ रुपये से लेकर तीन सौ रुपये की फाइन वसूली जाती है, लेकिन एजेंसी ने टो-चेन के बाद प्रति कार 750 और प्रति बाइक 445 रुपये वसूले। जो काम ट्रैफिक पुलिस का था वह एजेंसी ने किया। एजेंसी के कर्मी ही टो-चेन किए गए वाहनों के पेपर मांगते थे और पेपर नहीं होने पर खुद ही चालान काटते थे। दिखावे के नाम पर सिर्फ एक पुलिसकर्मी साथ होता था। एजेंसी की इस मनमानी से राजस्व को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाया गया।राजधानी में जाम बस्टर से इस तरह उठाए जाते थे वाहन।

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