राजगीर में डेढ़ लाख साल पुरानी सभ्यता के मिले प्रमाण

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पटना : राजगीर में इतिहास की कई नयी परतें खुल रही हैं. बिहार विरासत विकास समिति और नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की ओर से राजगीर के टोटल स्टेशन सर्वे के दौरान वहां की पंच पहाड़ियों पर डेढ़ लाख साल पुरानी सभ्यता के प्रमाण मिले हैं. वहां पुरापाषाण काल में आदिमानव द्वारा प्रयुक्त किये जाने वाले औजार पाये गये हैं, जो इस तथ्य की तस्दीक कर रहे हैं. यह वह दौर था, जब आदिमानव गुफाओं में रहता था.

उस युग में मनुष्य खेती नहीं करता था, बल्कि पत्थरों का प्रयोग कर शिकार करता था. बिहार विरासत विकास समिति के मुताबिक पंच पहाड़ियों पर अध्ययन के दौरान हस्तकुठार यानी हैंडेक्स मिले हैं. ये कई आकार प्रकार के हैं और इससे आदिमानव फलों के साथ मांस आदि को काटता-छिलता था.

पुरातत्वविदों के मुताबिक इस तरह के उपकरण दक्षिण भारत के अतिरमपक्कम, संघनकुल्लू, इनामगांव में मिले हैं. बिहार में अब तक 80 के दशक में जमुई के पैसरा में पाषाण काल के अवशेष मिले थे. इस कड़ी में राजगीर में मिले प्रमाण काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. अभी अध्ययन जारी है और उम्मीद है कि ऐसे और तथ्य निकल कर सामने आयेंगे, जिनसे यह पता चलेगा कि राजगीर न केवल सबसे पुराने शहरों में से एक रहा है, बल्कि यह ऐसी जगह रही है, जहां सभ्यता डेढ़ लाख साल से बसती-उजड़ती रही है.
बिहार विरासत विकास समिति और नालंदा विवि के संयुक्त अध्ययन में यह पता चला है कि राजगीर की पंच पहाड़ियों पर पुरापाषाण काल के मानवों ने पेंटिंग भी की थी. औजारों के अलावा इस साक्ष्य को भी प्रमाणिक तौर पर रख लिया गया है. राजगीर के टोटल स्टेशन सर्वे में राजगीर और उसके आसपास के क्षेत्रों को छाेटे-छोटे वर्गों में बांट कर पुरातत्वविद और इतिहासवेत्ता अध्ययन कर रहे हैं.
इसमें अभी ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार का भी प्रयोग होना है, जिसमें जमीन के अंदर रडार के जरिये अध्ययन होगा. वरिष्ठ पुरातत्वविदों के मुताबिक बिहार में पुरापाषाण काल के अवशेष 80 के दशक के शुरुआती वर्षों में मृदुला जायसवाल की अगुआई में किये गये उत्खनन में बिहार के जमुई के पैसरा में मिले थे. यदि देश भर की बात की जाये तो तमिलनाडु के कुरनूल, कर्नाटक के हुंस्नगी, ओड़िशा के कुलिआना, राजस्थान के डिडवाना के शृंगी तालाब के निकट और मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पुरापाषाण काल के अवशेष मिले हैं. इन अवशेषों की संख्या मध्य पाषाण काल के प्राप्त अवशेषों से बहुत कम है. इस कारण राजगीर खास है.
क्या है पुरापाषाण काल?
जिस समय आरंभिक मानव पत्थर का प्रयोग करता था, उस समय को पुरातत्वविदों ने पुरापाषाण काल नाम दिया है. यह शब्द प्राचीन और पाषाण (पत्थर) से बना है. यह वह कल था, जब मनुष्य ने पत्थरों का प्रयोग सबसे अधिक किया. पुरातत्वविदों के अनुसार, पुरापाषाण काल की अवधि 20 लाख साल से 12 हजार साल पूर्व तक है. इस युग को तीन भागों में बांटा गया है- आरंभिक, मध्य और उत्तर पुरापाषाण युग. माना जाता है कि मनुष्य इस युग में सबसे अधिक दिनों तक रहा है.
इस युग में मनुष्य खेती नहीं करता था, बल्कि पत्थरों का प्रयोग कर शिकार करता था. इस युग में लोग गुफाओं में रहते थे. इस युग में सबसे महत्वपूर्ण काम जो मानव ने सीखा, वह था आग को जलाना. आग का उपयोग विभिन्न कार्यों के लिए होने लगा. कुरनूल की गुफाओं में इस युग की राख के अवशेष प्राप्त हुए हैं. इस युग का मनुष्य चित्रकारी करता था, जिसका प्रमाण उन गुफाओं से मिलता है, जहां वह रहता था.
पुरापाषाण काल की सभ्यता: 20 लाख साल से 12 हजार साल पूर्व तक
तमिलनाडु के कुरनूल, कर्नाटक के हुंस्नगी, ओड़िशा के कुलिआना, राजस्थान के डीडवाना के शृंगी तालाब के निकट और मध्य प्रदेश का भीमबेटका
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नवपाषाण काल की सभ्यता 
8000 ईसा पूर्व से 4000 ईसा पूर्व तक 
बिहार का चिरांद, दक्षिण भारत का कोल्डिहवा, पैय्यमपल्ली, कश्मीर का बुर्जहोम, पूर्वोत्तर भारत का दाओजलि हेडिंग, पश्चिमी पंजाब का मेहरगढ़
शहरी सभ्यता 4000 ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता, मोहनजोदड़ो, मध्य भारत सभ्यता
राजगीर में डेढ़ लाख साल पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं, साथ ही पुरापाषाण काल से वर्तमान काल के प्रमाण भी हैं. अभी हम राजगीर और उसके आसपास के क्षेत्रों में नालंदा विवि के सहयोग से टोटल स्टेशन सर्वे करा रहे हैं, जिसमें कई और तथ्य भी प्रकाश में आयेंगे.
 
-विजय कुमार चौधरी, कार्यपालक निदेशक, बिहार विरासत विकास समिति 
राजगीर में न केवल पुरापाषाण काल, बल्कि मध्य पाषाण और नवपाषाण काल के भी साक्ष्य हैं. यह दुनिया के सबसे पहले बसे शहरों में एक है. पंच पहाड़ियों पर बना साइक्लोपियन वॉल भी खास है, जिसे शुरुआती शहरी सभ्यता में ही बनाया गया था. यह दुनिया के चुनिंदा दीवारों में से एक है.
-सत्येंद्र कुमार झा, वरिष्ठ पुरातत्वविद सह लेखक राजगृह: द सिटी ऑफ इमिनेंस
by : PK

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