माया के मोह में फंस गए हैं राहुल भैया!

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बाबा साहेब आंबेडकर को आदर्श और कांशीराम को अपना सियासी गुरु मानने वाली बीएसपी सुप्रीमो मायावती आज भी कइयों के लिए ‘माया’ ही हैं. बहनजी की माया को समझना राजनीति के बड़े बड़े धुरंधरों के लिए आसान नहीं है, तो ऐसे में सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के हाल ही में अध्यक्ष बने राहुल गांधी के लिए तो शायद बहुत ही कठिन होगा. वैसे तो मायावती सभी के लिए बहनजी हैं, लेकिन उनके जितने भी ‘सियासी भाई’ बने हैं वो शायद इस ‘माया’ को बेहतर जानते हैं.

जो बहनजी अभी तीन महीने पहले बेंगलुरु की विधानसभा के सामने सोनिया गांधी से गलबहियां कर रही थीं, वो अब बगैर किसी उकसावे को उन्हीं सोनिया के लाडले राहुल को आंखें तरेर रही हैं. वैसे कुमारस्वामी की शपथ ग्रहण की वो तस्वीरें जब रिवाइंड करके आज देखीं, तो साफ दिखा कि बहनजी को गले लगाने की कोशिश सोनिया गांधी ने पहले की थीं, तब बहनजी उनसे गले लगीं. आज बहन मायावती राहुल की कांग्रेस को अपना ‘सम्मान’ याद दिला रही हैं और साफ कह रही हैं कि हमें अपनी दोस्ती का हिसाब बराबर का रखना होगा.

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दरअसल, बहनजी कुछ बातों को अच्छे से जानती हैं. पहला कि कांग्रेस की हालात यूपी में आज भी बेहद खराब है और दूसरी बात ये कि वोट बैंक पर खड़ी बीएसपी की मौजूदगी देश के किसी एक या दो राज्यों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कई सूबों में अच्छी खासी है. अपनी झोली में लोकसभा के 6 से 7 फीसदी वोट बीएसपी ने हमेशा रखे हैं और ये ही मायावती की सबसे बड़ी ताकत है. ये 7 फीसदी लोग जिस धड़े के साथ जुडेंगे वो ना सिर्फ अजेय होगा, बल्कि दूसरे का काम-तमाम तक कर सकता है.

मायावती की बगैर कहे शर्त बहुत साफ समझ आ रही है कि राहुल गांधी को ‘तयशुदा विजयी’ दिखाई दे रहे राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश चुनावों में अपनी संभावित जीत का केक बीएसपी के साथ शेयर करना होगा. मायावती के ताज़ा तेवरों से साफ है कि राहुल गांधी अगर नहीं झुकें, तो बीएसपी हर वो कोशिश कर सकती है, जिसमें कांग्रेस के लिए परेशानी खड़ी हो. क्या राहुल गांधी के लिए मायावती के अड़ियल रुख को नज़रअंदाज़ करना आसान होगा? बात केवल तीन विधानसभा के चुनावों में ही नहीं बिगड़ेगी… बात बिगड़ी तो इसका असर दूर तक दिखाई देगा. यानी 2019 के लोकसभा चुनावों में तो राहुल की अगुवाई वाली कांग्रेस ना महागठबंधन के साथ होगी और ना ही यूपी में मोदी की बीजेपी का मुकाबला करने की ताकत जुटा पाएगी?

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साफ है कि राहुल माया ‘जाल’ में फंस चुके हैं और इस माया ‘मोह’ से निकलना उनके लिए आसान नहीं है. मायावती को राहुल अपने साथ रखना चाहें तो राहुल गांधी को 2004 वाली सोनिया की ‘त्याग’ वाली कांग्रेस का आचरण अपनाना होगा. विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी कांग्रेस को बीएसपी की मायावती को अघोषित तौर पर प्रधानमंत्री पद के लायक वाला भाव देना होगा.

यूपी में बीएसपी कम से कम 40 से 45 सीटों पर लड़े और यूपी के बाहर कांग्रेस बहनजी के लिए कम 20-25 सीटें छोड़ें. यानी 60 से 70 सीटों पर बीएसपी देश भर में कांग्रेस की मदद से लड़े. बीएसपी हर कीमत पर देश की तीसरी बड़ी पार्टी बने इसका इंतज़ाम राहुल की कांग्रेस को ही करना होगा, ताकि बहनजी का भरोसा जीता जा सके. और ये सब अभी ही तय करना होगा. ताकि अगर 2019 में त्रिशंकु लोकसभा के नतीजे आएं तो बहनजी का कल्याण हो सके और उन्हें भले ही कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन कांग्रेस व अन्य बीजेपी विरोधी पार्टियां 7 लोक कल्याण मार्ग तक पहुंचा सके.

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मायावती हाल ही में कांग्रेस को बार बार जता चुकी हैं कि वो महागठबंधन में कांग्रेस को लाने के लिए कतई आतुर नहीं हैं. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बागी अजित जोगी की पार्टी से समझौता करना. यूपीए-2 सरकार को भी भ्रष्ट सरकारों की कैटेगरी में खड़ा करना और पेट्रोलियम पदार्थों की बेतहाशा बढ़ोतरी के लिए भी बहनजी ने मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों को ही जिम्मेदार ठहराया था. यानी राहुल भैया को माया ‘जाल’ से निकलने के लिए तीनों विधानसभाओं में बीएसपी को ‘सम्मानजनक’ सीटें देनी होंगी और यूपी में लोकसभा के चुनाव ठीक से लड़ने और जीतने के लिए अभी से ही बहन मायावती के मिज़ाज को भांपना होगा. नहीं तो चौबे जी चले तो थे छब्बे बनने और कहीं राहुल भैया को दुबे बनकर ना लौटना पड़े!

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