महापंडित राहुल सांकृत्यायन की जयंती

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अदम्य और सदा-अतृप्त जिज्ञासु थे महापंडित राहुल सांकृत्यायन। जगत और जगदीश को जानने की उनकी अकुलाहट बहुत भारी थी। वे संसार के सभी निगूढ़ रहस्यों को शीघ्र जान लेना चाहते थे। यही जिज्ञासा उन्हें जीवन-पर्यन्त बेचैन और विचलित किए रही, जिससे वे कभी, कहीं भी स्थिर नहीं रह सके। दौड़ते-भागते रहे। लेकिन इसी भागमभाग ने उन्हें संसार का सबसे बड़ा यायावर साहित्यकार, चिंतक और महापंडित बना दिया। जब पर्यटन और देशाटन का कोई भी सुलभ साधन नहीं था, उस काल में भी उन्होंने संपूर्ण भारत वर्ष की ही नहीं, तिब्बत, चीन, श्रीलंका और रूस तक की लम्बी यात्राएं की। जहां गए वहां की भाषा सीखी। इतिहास और साहित्य का गहन अध्ययन किया और संसार के सभी धर्मो का सार-तत्व लेकर अपने विपुल साहित्य के माध्यम से संसार को लाभान्वित किया। वे विश्व की भाषाओं के पंडित और प्रयोगकर्ता थे। हिन्दी का संसार उन्हें यात्रा-साहित्य के पितामह के रूप में मान्यता देता है। खच्चरों पर लाद कर उन्होंने तिब्बत से अनेक दुर्लभ पांडुलिपियां वापस कर भारत को दी, जो आज भी पटना संग्रहालय में उपलब्ध है। यह बातें मंगलवार को यहां बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में राहुल जी की जयंती पर आयोजित समारोह और विचार-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने कहीं। उन्होंने कहा कि उनकी विद्वता और मेधा अद्भुत थी, जिनसे प्रभावित होकर काशी के पंडितों ने उन्हें महापंडित की उपाधि दी। वे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के भी अध्यक्ष रहे, जिसपर सम्मेलन को सदा गौरव रहेगा। उनका बहुचर्चित उपन्यास ‘‘बोल्गा से गंगा’ ऐसी अमर कृति है, जिसमें उन्होंने कथा-रूप में, किस प्रकार मानव-सभ्यता विकसित हुई, उसके क्रमिक विकास को, संसार के सामने अत्यंत सरलता से रख दिया है। यह एकमात्र पुस्तक पढ़कर एक सामान्य व्यक्ति भी आदिम काल से आधुनिक-संसार तक, मानव सभ्यता कैसे आगे बढ़ी, जान सकता है। वे निरंतर चलते और लिखते रहे। जब उनके पैर थमते, तब लेखनी चलने लगती। वे अद्वितीय यायावर थे। समारोह का उद्घाटन करते हुए वरिष्ठ कथाकार जियालाल आर्य ने कहा कि राहुल जी ने संसार में प्रचलित सभी प्रमुख धर्मो के साहित्य का गहरा अध्ययन किया। बौद्ध-धर्म पर उनके कार्य से संसार खूब परिचित है। अपने विपुल अध्ययन के पश्चात वे इस नतीजे पर पहुंचे कि संसार को मानव-धर्म का पालन करना चाहिए। समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में सिक्किम से पधारे राहुल जी के पुत्र और सिक्किम विविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉ. जेता सांकृत्यायन ने कहा कि पटना आना उन्हें ऐसा लगता है जैसे वह अपने पिता के पास पहुंचे हैं,अपने घर आए हैं। उन्होंने कहा कि उनके पिता राहुल जी ने जो कुछ भी लिखा वह उनके अपने गहन अध्ययन और अनुभवों के प्रतिफल है। यह राहुल जी ने अपनी जीवन यात्रा नामक आत्म-कथा में स्वयं ही स्वीकार किया। उसमें उन्होंने लिखा कि मुझे कोई औपचारिक शिक्षा भी पाने का अवसर नहीं मिला। यात्रा-साहित्य लिखने से पहले, यात्रा-साहित्य पर कुछ भी देखने को नहीं मिला। इसलिए जैसा उचित लगा, बस लिखता गया। उन्होंने अपने साहित्य से अगली पीढ़ी को प्रेरणा दी। उन्होंने यात्रा-साहित्य के लिए इतनी सामग्री दी कि साहित्य की इस विधा में आगे बढ़ने वाले साहित्य-सेवी आधार रूप में बहुत कुछ पा सकते हैं। अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के प्रधान मंत्री डा. शिववंश पाण्डेय ने कहा कि राहुल जी ने यात्रा-साहित्य को शास्त्रीय रूप दिया। उन्होंने यात्रा-साहित्य को दो दृष्टियों से देखा और लिखा। उन्होंने अपने यात्रा साहित्य में इतिहास को भी समेटा और भूगोल को भी। इस दृष्टि से उनकी कृतियां ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रखती है। सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त, डा. शंकर प्रसाद, डा. मधु वर्मा, डा. कल्याणी कुसुम सिंह, डा. नागेश्वर प्रसाद यादव, शुभचंद्र सिन्हा तथा अंबरीष कांत ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर लघुकथा-गोष्ठी भी हुई। मंच संचालन साहित्य मंत्री डा. भूपेन्द्र कलसी तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रबंध मंत्री कृष्णरंजन सिंह ने किया।

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