महागठबंधन पर छाया मुद्दों का संकट

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पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक के बाद बिहार में महागठबंधन के सामने मुद्दों का संकट नजर आ रहा है। आरक्षण को हथियार बनाकर राष्‍ट्रीय जनता दल (राजद) माहौल बनाने की कोशिश जरूर कर रहा है, लेकिन सहयोगी दलों की सांसें अभी सम्मानजनक सीटों की हिस्सेदारी में ही अटकी हैं।
लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने वाली है और अभी तक एक संयुक्त रैली भी नहीं कर सकने वाले महागठबंधन के घटक दल मुद्दों के मसले पर सुस्त हैं। राजद को छोड़कर बाकी किसी पार्टी के पास अभी तक राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की संयुक्त ताकत से मुकाबले के लिए न तो असरदार मुद्दा है, न फॉर्मूला और न ही कोई रणनीति नजर आ रही है।

चुनावी सरगर्मी बढ़ने के पहले हमलावर था विपक्ष
हैरत यह भी है कि बिहार में संसदीय चुनाव की सरगर्मी बढऩे से पहले महागठबंधन के सभी सहयोगी दल विभिन्न मुद्दों पर सत्ता पक्ष के खिलाफ हमलावर थे। वे बात-बात पर आंदोलन कर रहे थे। पार्टी कार्यालयों से निकलकर सड़कों पर नारे बुलंद कर रहे थे। यहां तक कि महीने भर पहले विधानसभा के बजट सत्र के दौरान सड़क से सदन तक सत्ता पक्ष के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा था। पुलिस-प्रशासन की नाकामी के नारे गढ़े-पढ़े जा रहे थे। किंतु चुनाव की तपिश बढ़ते ही सभी दल पब्लिक से कटे नजर आ रहे हैं।

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अभी फंसी सम्‍मानजनक सीटों की फांस
महागठबंधन के घटक दलों के पटना से बाहर दिल्ली और रांची के दौरे ही ज्यादा हो रहे हैं। उनकी सूची से गांव-किसान, महिला, मजदूर और बेरोजगार गायब हैं। सारा दिमाग सीट हथियाने में लगा है। सम्मानजनक सीटों का पैमाना भी सबके लिए अलग-अलग है। किसी को 16 चाहिए तो किसी को छह तो कोई तीन से कम पर मानने के लिए तैयार नहीं है। किसी ने दूसरे घटक दल को ही पैमाना बना रखा है। उसे दूसरे से कम-से-कम एक ज्यादा चाहिए।
आरक्षण्‍ा के मुद्दे पर चुनावी तैयारी में जुटा राजद
महागठबंधन में सिर्फ राजद ही सक्रिय दिख रहा है। हालांकि, तेजस्वी यादव की सरकार विरोधी यात्राओं को अगर अपवाद मान लिया जाए तो राजद का नया नेतृत्व सोशल मीडिया के बुखार से बाहर नहीं निकल पा रहा है। तेजस्‍वी के हाल के तेवर का आकलन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि वे आरक्षण के मुद्दे पर ही लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं।

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गरीब सवर्णों को आरक्षण दिए जाने के बाद तेजस्वी ने एससी-एसटी और ओबीसी के आरक्षण के दायरे को 49.50 फीसद से बढ़ाकर 90 फीसद करने के लिए प्रदेशभर में आंदोलन चला रखा है। इसके पहले केंद्र सरकार ने विश्वविद्यालयों में 13 प्वाइंट रोस्टर को सुधारकर राजद से यह मुद्दा छीन लिया।
सोशल मीडिया से निकल सड़कों पर आने की जरूरत

बिहार में मुद्दों की कमी नहीं है। धान खरीद की सुस्त रफ्तार, बाढ़, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विशेष राज्य के मसले पर विपक्ष आंदोलन खड़ा करके सत्तारूढ़ दलों को परेशान कर सकता है, लेकिन इसके लिए उसे सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों पर आने की जरूरत है।
गुम हो गया रालोसपा का आंदोलनकारी तेवर

बिहार समेत देशभर में शिक्षा की बदहाली और न्यायपालिका में आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र सरकार में रहते हुए राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) ने काफी हल्ला मचाया था। पार्टी ने पटना के गांधी मैदान में मानव कड़ी से लेकर दिल्ली में धरना-प्रदर्शन किया था। बाद में इसी मसले पर राजग और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का साथ छोड़कर उपेंद्र कुशवाहा महागठबंधन का हिस्सा बन गए।

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शिक्षा में सुधार के एजेंडे पर दो फरवरी को कुशवाहा ने पटना में आक्रोश मार्च निकाला। इसी दौरान पुलिस लाठीचार्ज में घायल भी हुए, जिसके खिलाफ महागठबंधन के घटक दल एकता का प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतरे। उसके बाद से पब्लिक को कुशवाहा के आक्रामक तेवर का इंतजार है। बात-बात पर आंदोलन पर उतर जाने वाली रालोसपा कहीं खो सी गई है।

रांची में अटकी है जीतनराम मांझी की मुराद
हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) ने भी बिहार की सड़कों पर कम समय नहीं बिताया है, लेकिन अभी सम्मानजनक सीटों के फेर में फंसा है। महिला अधिकार, पेट्रोलियम पदार्थों की महंगाई एवं मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के मसलों पर सड़कों पर दल-बल के साथ उतरने वाले जीतनराम मांझी का ज्यादातर समय अभी पटना-रांची करने में बीत रहा है।

मांझी बिहार के पहले ऐसे नेता हैं, जिन्होंने पिछले तीन-चार महीने के दौरान रांची का सबसे ज्यादा दौरा किया होगा। सीट बंटवारा और मांझी की आकांक्षा का फॉर्मूला लालू के पास ही है।

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