मंत्रियों को होमवर्क सौंप चीन पहुंचे मोदी यही तो अंदाज है

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पिछले तीन सालों में नरेन्द्र मोदी ने अपने फैसलों से सभी को चौंकाया है। बार-बार चौंकाया है। सबसे ज्यादा सही खबरें बताने और दिखाने का दम भरने वाले हम जैसे मीडिया के लोगों द्वारा लगाए जा रहे अनुमान और बताए जा रहे तयों और तकरे को मोदी ने बड़ी सहजता से झुठलाया है। मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल होने वाले तथा मंत्रिमंडल से बाहर जाने वाले लोगों के नामों को लेकर पिछले कई दिनों से मीडिया में र्चचा-परिर्चचा चल रही थी। कौन हट रहा है, कौन बन रहा है, किसका कद बढ़ रहा है और किसका घट रहा है। इन सबके नामों की र्चचा लगभग एक ही तरह से मीडिया में चल रही थी। जिन नौ लोगों को मोदी ने अपने कैबिनेट में राज्यमंत्री के रूप में शामिल किया है। उनके नाम सही-सही कल देर शाम तब पता चले जब सरकार और पार्टी की तरफ से इन नामों का खुलासा कर दिया गया। जिन चार मंत्रियों को कैबिनेट मंत्री के रूप में मोदी ने अपनी टीम में शामिल किया। उन चार के बारे में भी सही अनुमान लगाने में हम चूक गए। इसके बाद कई ऐसों के विभाग बदले, जिनके बारे में हम सोचते नहीं थे और कई ऐसे मंत्रियों को तरक्की मिली, जिनका हमें बिल्कुल भी अनुमान नहीं था। निर्मला सीतारमण के मंत्रिमंडल से बाहर जाने की खबरें चल रही थीं और आज वह रक्षा मंत्री बना दी गई। कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह के मंत्रिमंडल से बाहर जाने और नहीं तो कम से कम विभाग बदले जाने की खबर हम सभी ने चलाई, दिखाई। लेकिन प्रधानमंत्री उनके काम से संतुष्ट दिखे। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी व्यक्ति के बारे में आकलन करने का पीएम का तंत्र हम सबसे बिल्कुल अलग है। कल बताया गया कि मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले नए लोगों या फिर पहले से शामिल लोगों के विभाग बदले जाने, जिम्मेदारी कम किये जाने या फिर बढ़ाए जाने का फैसला संबंधित व्यक्ति में पैशन (काम करने का जुनून), प्रोफिशिएंसी (काबिलियत), पालिटिकल अंडरस्टैंडिंग (राजनीतिक समझ) और प्रोफेशनल एक्युमेन (राजनीतिक कुशाग्रता) देखकर किया गया है। दरअसल, पीएम का दिमाग और उनकी नजर चौबीसों घंटे अलर्ट मोड में रहती है। किसी भी कार्यक्रम या समारोह में यदि प्रधानमंत्री रहते हैं तो उनकी नजर वहां मौजूद लोगों की भाव-भंगिमा और उनके आसपास खड़े लोगों पर होती है। प्रधानमंत्री जब संसद में मौजूद होते हैं तो वह विपक्षी दलों के नेताओं पर नजर तो रखते ही हैं साथ ही साथ वह अपने सांसदों द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दे और पूछे जाने वाले सवाल के साथ-साथ मंत्रियों द्वारा दिए जाने वाले जवाब और तमाम कुशलताएं भी ध्यान से देखते और समझते हैं। विपक्षी दलों के नेता लगातार कहते आ रहे हैं कि प्रधानमंत्री और पीएमओ ही सारे मंत्रालय चला रहे हैं। दरअसल प्रधानमंत्री नियमित तौर पर मंत्रालयों के सचिव व दूसरे बड़े अधिकारियों से कामकाज की समीक्षा बड़ी बारीकी से करते हैं। इतना ही नहीं वह कैबिनेट के राज्यमंत्रियों से एक निश्चित अवधि पर नियमित मिलते हैं और उनके मंत्रालयों में हो रहे कामकाज पर उनके विचार व मंत्रालय के कामकाज संबंधित सूझबूझ भी परखते हैं। मंत्रियों की क्षमता व मंत्रियों के जरिए ही उनसे संबंधित मंत्रालयों के कैबिनेट मंत्रियों के बारे में फीडबैक लेते हैं। तात्पर्य यह है कि मोदी स्वत: अपनी टीम के लोगों पर कई तरह से नजर रखते हैं और उनके कामकाज व उनकी गतिविधियों पर बारीकी नजर रखते हैं। कई बार ऐसा सुनने में आया कि मंत्रालय के कामकाज से संबंधित गलत रिपोर्ट देने पर संबंधित मंत्री व अधिकारियों की क्लास लगती रही है। यही वजह है कि न मीडिया सही अनुमान लगा पाता है और न ही पार्टी के बड़े नेता। मोदी सरकार चलाने की परंपराओं और मान्यताओं से अलग काम करने के आदी हैं। वह अपनी टीम में सिर्फ ऐसे लोगों को रखना चाहते हैं जो उनके द्वारा लिए गए फैसलों व नीतियों का तय समय-सीमा में शत-प्रतिशत क्रियान्वयन सुनिश्चित कर सकें।आज के मंत्रिमंडल विस्तार में किसको क्या मिला और कितना मिला या फिर किसका कितना चला गया। यह सवाल हम जैसों को व्याख्या के लिए छोड़ दिया गया है। शपथ ग्रहण के दौरान राष्ट्रपति भवन में मौजूद मोदी के चेहरे और उनकी भाव-भंगिमा को जिस किसी ने भी देखा होगा, सहज कह सकता है कि शरीर से वह राष्ट्रपति भवन में थे पर वास्तव में थे कहीं और। उनके चेहरे पर थोड़ी चिंता और तनाव था। वह किस उधेड़-बुन में थे कहना और समझना अनुमान ही है, पर मैं कह सकता हूं कि उनके दिमाग में ब्रिक्स समिटके दौरान होने वाले घटनाक्रम और रणनीति चल रही होगी। लोग विस्तार में खोने-पाने के चक्कर में तरह-तरह की र्चचाओं में व्यस्त हैं और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री सबको होमवर्क देकर चीन पहुंच गए हैं।मोदी के काम करने के तौर-तरीकों और उनके द्वारा किए गए तमाम फैसलों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह उनके काम करने का अपना स्टाइल है। गुजरात में मुख्यमंत्री के तौर पर काम करते हुए और फैसले लेते हुए जिस किसी ने भी उन्हें देखा है उसे प्रधानमंत्री के रूप में काम करने के उनके स्टाइल और फैसले लेने के अंदाज पर बिलकुल आश्र्चय नहीं होता है। बावजूद इसके न नेता मानने को तैयार और न ही मीडिया समझने को तैयार।

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