भारत-चीन वार्ता

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भारत और चीन के बीच बीजिंग में निरस्त्रीकरण और नाभिकीय अप्रसार वार्ता का क्या नतीजा, निकला इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह है कि दोनों देशों ने शांतिपूर्वक इसे अंजाम दिया है। दोनों देशों के बीच यह अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एवं निरस्त्रीकरण के मुद्दे पर र्चचा का प्रमुख मंच है। पांचवे दौर की इस वार्ता का महत्त्व इस मायने में भी है कि चीन द्वारा नाभिकीय आपूत्तर्िकर्ता समूह या एनएसजी में भारत के प्रवेश को बाधित करने के बीच यह बातचीत हुई है। ऐसी बातचीत के सारे बिंदुओं का प्राय: सार्वजनिक नहीं किया जाता। इसलिए यह जानना कठिन है कि भारत की ओर से इसमें एनएसजी में प्रवेश का मुद्दा उठाया गया या नहीं। किंतु इस समय उत्तर कोरिया द्वारा दुनिया को धता बताते हुए अपनी नाभिकीय अस्त्र शक्ति में वृद्धि से जो माहौल बना हुआ है उस पर निश्चय ही र्चचा हुई होगी। जाहिर है, यदि यह विषय वार्ता में आया तो फिर भारत उत्तर कोरिया के रवैये पर चीन के रु ख से अवगत हुआ होगा। हालांकि बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास की ओर से जो कुछ कहा गया, उसमें न तो उत्तर कोरिया का उल्लेख है और न ही एनएसजी का। उसमें केवल इतना कहा गया है कि दोनों देशों ने आपसी हित के विभिन्न विषयों पर र्चचा की। इसमें बहुपक्षीय मंचों पर निरस्त्रीकरण एवं अप्रसार अप्रसार से जुड़े घटनाक्रम, नाभिकीय मसलों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में विज्ञान एवं तकनीक की भूमिका जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसका मतलब हुआ कि र्चचा के विषय काफी व्यापक थे। बहुपक्षीय मंचों पर निरस्त्रीकरण और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा तथा नाभिकीय मसलों पर यदि र्चचा होगी तो उत्तर कोरिया एवं पाकिस्तान का जिक्र भारत की ओर से अवश्य ही होना चाहिए। हमारे लिए तो पाकिस्तान द्वारा अपनी नाभिकीय शक्ति का विस्तार और उसकी सुरक्षा का मुद्दा सबसे अहम है। चीन की क्या प्रतिक्रिया रही होगी इसका आकलन जरा कठिन है। किंतु दोनों देश ऐसे मसलों पर खुलकर बातचीत करें यह अच्छा ही है। जिस तरह चीन 48 सदस्यीय एनएसजी में ज्यादातर देशों के चाहते हुए भी भारत द्वारा नाभिकीय अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न करने को आधार बनाकर प्रवेश को रोक रहा है, उसमें इन मसलों पर आपसी सहयोग की संभावना अभी न के बराबर है। पाकिस्तान को चीन छोड़ नहीं सकता। इसलिए ऐसी वार्ताओं से बहुत ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती।

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