भाजपा बिहार विधान सभा चुनाव एनडीए के प्लेटफार्म पर बड़े भाई की भूमिका के साथ लड़ने जा रही !

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भारतीय जनता पार्टी का दबदबा उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल में क्या बढ़ा प्रदेश भाजपा के रणनीतिकार बिहार में सीटों कींिहस्सेदारी के समीकरण को नया स्वरुप दे कर सुलझाने में लग गये हैं। दबाव एक बार फिर बिहार में बड़े भाई की भूमिका के निर्वहण की मांग संगठन के स्तर पर और संघ के कार्य विस्तार पर हावी होने लगा है। भाजपा के सांगठनिक तैयारियों के बीच रिकार्ड सदस्य बनाने के खेल के पीछे अधिक-से-अधिक विधान सभा सीटों को अपनी पकड़ में लेना भी है। भाजपा के रणनीतिकारों की माने तो गठबंधन धर्म का पालन करते आगामी बिहार विधान सभा चुनाव भाजपा अपनी श्रेष्ठता बरकरार रखने के लिए भी लड़ने जा रही है। और यह सब गंठबंधन में शामिल दलों को अंधेरों में रख कर नहीं बल्कि इस चुनावी समीकरण के मजबूत तयों को उनके सामने रख कर भाजपा सर्वसम्मति की राह पर इसे अंजाम देना चाहती है। भाजपा के भीतर बिहार में भाजपा मुख्यमंत्री की उठी मांग जदयू के दरबाजे पर पड़ा एक दस्तक भर नहीं है बल्कि राज्य मे बदलते राजनीतिक हालात के बरक्स भाजपा की सुदृढ़ रणनीति भी है।

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मिली जानकारी के अनुसार भाजपा बिहार विधान सभा चुनाव एनडीए के प्लेटफार्म पर बड़े भाई की भूमिका के साथ लड़ने जा रही है। इस भूमिका को ले कर भाजपा के रणनीतिकार का पहला तर्क है कि भाजपा अब तीन सौ से ज्यादा सांसदों की पार्टी हो गई है। दूसरा तर्क यह कि लोकसभा चुनाव 2019 में 17-17 सीटों पर लड़ने वाली भाजपा व जदयू में हार का सामना जदयू को करना पड़ा था। हिस्सेदारी की 17 लोकसभा सीटें यानी सौ फिसदी सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी जबकि जदयू को 17 लोकसभा सीटों में से 16 लोकसभा सीटों पर जीत मिली थी।

भाजपा जिस तीसरे तर्क के साथ बड़े भाई की भूमिका में आने को सवार है वह है भाजपा का वोट प्रतिशत। भाजपा रणनीतिकार वर्ष 2014 और वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा व जदयू के मिले वोट प्रतिशत को भी रखना चाहती है। भाजपा वर्ष 2014 लोकसभा में 30 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ कर बिहार में 29.40 प्रतिशत वोट हासिल की थी जबकि जदयू के साथ रह कर भाजपा 2019 लोकसभा चुनाव में लड़ी तो उसका वोट प्रतिशत घट कर 23. 58 प्रतिशत पर आ गया। वहीं जदयू जब भाजपा से अलग लड़ी तो 2014 के लोकसभा चुनाव में 16.04 प्रतिशत वोट मिला और जब भाजपा के साथ 2019 लोकसभा चुनाव लड़ी तो जदयू के वोट बैंक में इजाफा हुआ और यह प्रतिशत वर्तमान चुनाव में 21.8 प्रतिशत जा पहुंचा।

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भाजपा के रणनीतिकार नेचुरल जस्टिस के साथ चल कर आगामी विधान सभा चुनाव की तैयारी भी इसी तेवर के साथ कर रहे हैं जहां पूरे सांगठनिक ठांचा को नया स्वरूप दिया जा रहा है। और यह स्वरूप बूथ लेवल से ही शुरू हो चुका है जहां प्रत्येक बूथ पर 19 लोगों की एक कमेटी बनेगी जिसका नेतृत्व के लिए एक बूथ पालक की संरचना खड़ी की गई है। इस बूथ पालक के नेतृत्व में कमेटी के हर सदस्य को बूथ के लिए तैयार वोटर लिस्ट के एक -एक पन्ने का जिम्मेवार बनाया गया है। हर सदस्य को वोटर लिस्ट के एक पन्ने में शामिल किये गये 50 व्यक्तियों से संपर्क भी रखना है। इस बूथ से उपर उठ कर संगठनिक ढ़ांचा को शक्ति केन्द्र, मंडल, जिला व प्रदेश स्तर तक नई पहचान भी देना है।

इस वृहद उद्देश्य को ले कर चल रही भाजपा को बिहार विधान सभा चुनाव को ले कर जो रणनीति तैयार की गई है उसके अनुसार भाजपा-जदयू 51: 49 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ लड़ना चाहती है। भाजपा ने अपनी इस मंशा का खुलाशा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बदलने की बात कह कर उठा दी। मगर इस बात को तुल तब मिलने लगा जब लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने यह कह दिया कि जब तक भाजपा नेतृत्व परिवर्तन नहीं करती नीतीश कुमार नेता बने रहेंगे। वैसे

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भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के बाद बनी स्थितियां को देख जदयू वैसे ही समझौता करेगी जैसे भाजपा ने लोकसभा चुनाव में जीती हुई पांच लोकसभा सीटों को जदयू को दे कर गठबंधन के हित में की थी।

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