ब्रज से अलबेली है बनगांव की होली, हजारों लोग खेलते घुमौर होली

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सहरसा जिला मुख्यालय से आठ किमी पश्चिम कहरा प्रखंड के बनगांव में मनाई जाने वाली ‘घुमौर होली’ की अपनी अलग पहचान है. इसमें लोग एक-दूसरे के कंधे पर सवार होकर, जोर-आजमाइश करके होली मनाते हैं. घुमौर होली के त्‍योहार को फगुआ भी कहा जाता है. यहां होली फाल्गुन माह के अंतिम दिन मनाये जाने की परंपरा आज भी कायम है. गुरुवार को बनगांव में सुबह से ही होली का जश्न मनाया जा रहा है. संत लक्ष्मीनाथ गोसाई द्वारा शुरू की गयी बनगांव की होली ब्रज की ‘लट्ठमार होली’ की ही तरह ही प्रसिद्ध है.

बाबाजी ने तय किया था स्वरूप

बिहार की सबसे बड़ी आबादी वाले व तीन पंचायत के अधीन बसे बनगांव की होली की देश में एक अलग ही सांस्‍कृतिक पहचान है. यहां की ‘घुमौर होली’ इसी की एक कड़ी है. मान्‍यता है कि इसकी परंपरा भगवान श्रीकृष्‍ण के काल से ही चली आ रही है. वर्तमान में खेले जाने वाले होली का स्वरूप 18वीं सदी में यहां के प्रसिद्ध संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं (बाबाजी)ने तय किया था.

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विहंगम होता है होली का दृश्य
गांव के निवासी प्रो अरुण कुमार खां ने बताया कि इस होली का दृश्य अद्भुत होता है. युवाओं ने दो भागों में बंटकर खुले बदन गांव में घूमकर होली खेली. गांव के निर्धारित पांचों स्‍थलों (बंगलों) पर होली खेलने के बाद वे जैर (रैला) की शक्ल में भगवती स्थान पहुंचे. वहां वे गांव की सबसे ऊंची मानव शृंखला बनायी गयी है. होली के दौरान गांव के ललित झा बंगला व भगवती स्थान में सबसे अधिक लोगों की भीड़ देखी गयी. इस दौरान लोग संत लक्ष्मीपति रचित भजनों को गाते रहे.

होरी नहीं बलजोरी रे रसिया
भगवती स्‍थान के पास इमारतों पर रंग-बिरंगे पानी के फव्वारे लगाए गए थे. इनके नीचे लोग एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव शृंखला बना अपने ताकत की आजमाइस भी कर रहे थे. लोगों ने बताया कि होरी बनगांव में बलजोरी का प्रतिक है. इस बीच जगह-जगह गांव के घरों के झरोखों से महिलाएं भी रंग उड़ेलती रहीं. बच्चें आनंद लेते रहे. गांव में होली के रैला को देखने जिले के विभिन्न क्षेत्रों से लोगों का पहुंचना जारी था. होली का असली हुड़दंग दोपहर बाद टोलियों में जमा भीड़ माता भगवती के मंदिर पर जमा होने के बाद होली खेलने लगी. खासतौर से पुरुषों ने हुड़दंगी होली खेली. मानव शृंखला बनाकर होली खेलने तथा शक्ति प्रदर्शन के बाद बाबा जी कुटी में होली समाप्त हो गयी.

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सियासत नहीं भाईचारे का पर्व
बनगांव के पूर्व मुखिया धनंजय कुमार झा उर्फ भगवान जी सहित ग्रामीण सुमन समाज ने बताया कि बनगांव की होली में हिन्दू-मुस्लिम का भेद नहीं रहता है. ऐसे में आज के दिन कोई छोटा और बड़ा नजर नहीं आ रहा है. सहरसा से पहुंचे रवींद्र यादव, अजित यादव, बबन झा, सुमन झा ने बताया कि बनगांव की होली को खेलने वालों के अलावा देखने वालों की संख्‍या भी हजारों में रहती है. सांसद, विधायक या पूर्व विधायक ही नहीं कई आइएएस व बड़े व्यवसायी भी बनगांव की होली में शामिल होते हैं.

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