बिहार संवादी: साहित्य पर चर्चा हुई तो वैश्वीकरण से लेकर मीडिया तक के खंगाले गए हालात

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दैनिक जागरण के पहले ही दिन ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम अनेक वक्ताओं के विचार सहेजे खुद देश-दुनिया से संवाद करने लगा। सवाल पूछने लगा। ऐसे सवाल जिनके जवाब खुद इस कार्यक्रम में भी मिले, मगर जिनके जवाब वैश्विक पृष्ठभूमि में भी आवश्यक हैं। चाहे यूरोप हो या अमेरिका, सभी जगहों पर आर्थिक एवं सामाजिक विषमता, विचारधारा के प्रति कट्टरपन और असंवेदनशीलता ने सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है।

प्रमुख सवाल यह रहा कि आखिर हमें कौन सी राह अपनानी है? संतोष की बात यह रही कि वक्ता, जिनमें राजनीतिक क्षेत्र की दो बड़ी हस्तियां-बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित, के अलावा कई मशहूर साहित्यकार शामिल थे, समाज में सकारात्मक बदलाव के पक्षधर थे। सभी ने शांति एवं सद्भाव की जोरदार वकालत की। ‘बिहार संवादी’ यह पैगाम भी लेकर दुनिया से रूबरू है।

दो दिवसीय कार्यक्रम में पहले दिन यूं तो छह विभिन्न विषयों पर अलग-अलग सत्र आयोजित हुए, मगर उद्घाटन सत्र में ही नीतीश कुमार ने साहित्यकारों को उनकी जिम्मेदारी की याद दिला दी। कहा कि देश-दुनिया में आज संवाद और बहस नहीं होकर सीधे टकराव हो रहे, जिससे तनाव पैदा हो रहा। हमें सकारात्मक सोच को प्रोत्साहन देना होगा। सकारात्मक सोच ने ही ‘चंड अशोक’ को ‘धम्म अशोक’ बनाया। 1917 में महात्मा गांधी बिहार आए तो उसके बाद स्वतंत्रता संग्राम में जनभागीदारी बढ़ी। इसके 30 साल बाद ही हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई। बिहार ने हमेशा ही विश्व को ज्ञान की राह दिखाई है।

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हृदय नारायण दीक्षित ने इच्छा जताई कि ज्ञान के विकेंद्रीकरण और शोध के प्रोत्साहन को इस कार्यक्रम ने जो प्रोत्साहन दिया है, उसे और धार मिले। फिर शुरू हुआ सत्रों का दौर। युवा रंगकर्मी अनीश अंकुर द्वारा संचालित ‘सत्ता और साहित्य’ विषय पर पहले सत्र में दक्षिणपंथी, वाम और मध्यमार्गीय विचारधाराओं को उजागर करते हुए कई चुभते सवाल सामने आए जिनके जवाब साहित्यकार रामवचन राय और रेवती रमण ने दिए। रामवचन राय ने कहा कि सत्ता का चरित्र हमेशा दमनकारी नहीं रहा है।

दलित साहित्य को लेकर भी बात उठी और इसके मूल में सत्ता की चाहत के कारणों की विद्वानों ने अपने-अपने अंदाज में व्याख्या की। ‘नया समाज और राष्ट्रवाद’ पर आयोजित सत्र में हृदय नारायण दीक्षित और एसएन चौधरी ने हर जवाब में अपना दृष्टिकोण भी दर्शाया। देशभक्ति और राष्ट्रवाद के बीच अंतर, आक्रमक राष्ट्रवाद, प्रतीकों का राष्ट्रवाद आदि पर दोनों वक्ताओं ने अलग-अलग जवाब दिए। संचालनकर्ता डा. नेहा तिवारी ने दोनों वक्ताओं से ऐसे कई सवाल किए जो नौजवानों को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। नए समाज में गांधी की भूमिका भी तलाश ली गई।

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‘मीडिया की चुनौतियां’ विषय पर आयोजित सत्र का वरिष्ठ पत्रकार विकास कुमार झा ने संचालन किया। इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडीटर राणा यशवंत ने कहा कि समाज में विभिन्न प्रकार के भ्रम हैं, जिन्हें मीडिया के माध्यम से राजनेता सच्चाई का रूप देने की कोशिश करते हैं। मीडिया को इसका सच उजागर करना होगा। वहीं सीएनएन-आइबीएन की मारिया शकील ने ‘स्पॉट रिपोर्टिंग’ की आवश्यकता जताई। कहा, केवल न्यूज रूम में बैठे रहने से सही जानकारी नहीं मिलती।

दैनिक जागरण के एसोसिएट एडीटर सदगुरु शरण अवस्थी ने बिहार को तीन काल खंड में बांट कर अपनी बातें रखीं। उन्होंने कहा कि हमें सकारात्मक सोच के साथ अपने नायक तलाशने होंगे। आगे बढऩे के लिए यह आवश्यक है। एक अन्य सत्र में ‘नए पुराने के फेर में लेखन’ विषय पर चर्चा हुई। शशिकांत मिश्रा, क्षितिज राय, प्रवीण कुमार, ममता मेहरोत्रा जैसे नए साहित्यकारों ने अलग-अलग तर्क दिए।

मगर एक बात पर एकमत थे कि नए या पुराने लेखन के फेर से ज्यादा अहम ‘सच का फेर’ है। प्रवीण कुमार ने कहा-‘हत्या को जो निर्भय होकर हत्या कहेगा, अंत में वही कवि रहेगा।’ बिहार संवादी कार्यक्रम का थीम ‘हिंदी हैं हम’ रखा गया है, जिसे देख यशवंत राणा ने मंच से यह टिप्पणी की-‘हिंदी हैं, हिंदुस्तानी हैं, हिंदुस्तान के लिए सोचें।

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