बिहार दिवस समारोह में बिहारी कलाकारों को कम मिल रहा मौका

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जश्न का उत्साह। उम्मीदों का मेला। बदलाव की बयार। नशामुक्त और दहेजमुक्त बिहार। आगे बढ़ने की ललक। इतिहास रचने की चाहत। इस बार बिहार दिवस समारोह की यह खासियत होगी। समारोह में सब कुछ एक साथ दिखेगा। बस फर्क सिर्फ इतना होगा कि नयापन और विविधतता के नाम पर कुछ नहीं होगा। वही चेहरे और वही कार्यक्रम फिर दुहराये जायेंगे और सरकार इस नाम पर करीब पांच करोड़ रुपये रेवड़ी की तरह बांट देगी। इसका आवंटन भी किया जा चुका है। 22 मार्च से 24 मार्च तक होने वाले कार्यक्रम की अगुवाई का जिम्मा बिहार शिक्षा परियोजना परिषद को दिया गया है। बिहार शिक्षा परियोजना परिषद समारोह के आयोजन में जुट गयी है। सरकार के इस जश्न में कार्यक्रम पाने के लिए कलाकारों की लंबी लाइन लग गयी है। भरोसा है कि पिछले साल जिन कलाकारों को कार्यक्रम मिला था, इस बार भी मौका मिलेगा। उसके पीछे उनकी अपनी दलीलें भी हैं। किसी को पिछले साल किये गये कार्यक्रम का आधार है तो किसी को पैरवी का। अधिकारी भी कार्यक्रम देने में मस्त हैं। उन्हें बिहार और बिहारीपन से कोई मतलब नहीं है। उन्हें तो मतलब है सरकार की ब्रांडिंग हो। नतीजा यह है कि बिहार दिवस को लेकर आम लोगों का उत्साह फीका पड़ गया है और यह आयोजन महज राजकीय तमाशे भर रह गया है। बिहार दिवस के नाम पर पैसे की बंदरबांट ने इसके आयोजन पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। कभी भी इस आयोजन का ऑडिट नहीं कराये जाने से हर साल मनमानी बढ़ने की भी शिकायत मिलती रही है। आयोजन से जुड़े लोग भी खुद मानते हैं कि कार्यक्रम का स्तर भी गिरा है। इसके पीछे मुख्य कारण यह रहा है कि कार्यक्रम चयन के लिए जिन अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गयी है उनका कार्यक्रमों से कोई खास रिश्ता नहीं रहता है। बिहारीपन का भाव जगाने के उद्देश्य से बिहार दिवस समारोह की शुरुआत की गयी थी। लेकिन अब बिहार दिवस पर होने वाले आयोजनों में शुरुआती जज्बा नहीं है। जिस सोच से यह आयोजन शुरू किया गया था अब वह कहीं खो गयी है। बिहार के जाने-माने कलाकारों को तरजीह नहीं देने के कारण हर साल उनमें असंतोष रहता है। जिन कलाकारों को मौका दिया जाता है उन्हें मुख्य मंच से अलग कर दिया जाता रहा है। उनके दिन में कार्यक्रम होने से उन्हें सुनने या देखने भी नहीं जाता है। इस कारण स्थानीय कलाकार दर्शकों की उम्मीद लगाने और प्रतिभा का परिचय दिखाने की जगह सरकार के पेंमेंट पर ही भरोसा करते रहे हैं। मुख्य मंच पर फ्यूजन संगीत और सेक्सोफोन बजाने वाले बाहरी कलाकारों पर अधिकारियों को भरोसा है। उनके पटना लाने और रहने पर सरकार का हर साल लाखों रुपये खर्च होते हैं। लेकिन बिहारी कलाकारों को सरकार तीस-चालीस हजार रुपये देकर ही काम निपटाती रही है। इस बार जो खबरें आ रही हैं उसके अनुसार इंडियन बैंड हरप्रीत कौर, लखविन्दर बडाली, शुभा मृगदल आदि कलाकारों को फिर बुलाया गया है। स्वभाविक है बिहारी दर्शक इन्हें बिहार दिवस का मौके पर कई बार सुन चुके हैं। बिहार दिवस के जश्न की लोकप्रियता फीकी पड़ने से अब नहीं लगता है कि यह जश्न गांधी मैदान और श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल से बाहर निकल पायेगा। बिहार के बाहर जश्न मनाने की तो कोई खबर भी नहीं आ रही है। हालांकि शिक्षा विभाग ने दो-दो लाख रुपये सभी जिलों को भी दिया है लेकिन दो लाख रुपये उनके लिए ऊंट के मुंह में जीरा के समान है ।

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