बिहार के लोकगीतों में शास्त्रीयता का अभाव नहीं : शारदा सिन्हा

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बिहार के लोकगीतों में शास्त्रीयता का अभाव नहीं है। हमारी कोई विवशता नहीं है कि हम लोकगीतों में अश्लील या द्विअर्थी भावों को स्थान दे। इससे लोकगीतों के आदर में कमी आती है। हमारा कर्तव्य है कि हम लोकगीतों के स्वरूप को अक्षुण्ण बनाए रखें। मैथिली साहित्य संस्थान एवं बिहार पुराविद् परिषद के तत्वावधान में पटना संग्रहालय सभागार में रविवार को आयोजित सहोदरा कार्यक्रम में मुंशी रघुनंदन दास रचनावली का लोकार्पण किया गया। अपने व्याख्यान में पद्म भूषण शारदा सिन्हा ने कहा कि मैथिली, भोजपुरी, अंगिका, बज्जिका आदि लोक भाषाओं में समान भावनाएं हैं। अध्यक्षता करते हुए उषा किरण खान ने कहा कि लोकगीत ‘‘इतिहास के स्रेत होते हैं और लोकगीत, लोकगाथा, लोककथा को संरक्षित एवं सुरक्षित रखने के लिए शारदा सिन्हा के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया जाना चािहए। उन्होंने शारदा सिन्हा से यह भी अनुरोध किया किजिस प्रकार उन्होंने छठ गीत एवं सामा चकेवा को नया स्वरूप दिया है उसी प्रकार संबंध गीत को भी बढ़ावा दें। कार्यक्रम में पद्म भूषण शारदा सिन्हा को पद्मश्री उषा किरण खान द्वारा सम्मानित करने के साथ उन्हें खोईंछा भी दिया गया। उनके पति डॉ. बीके सिन्हा को भी सम्मानित किया गया। शारदा सिन्हा ने अपना संस्मरण सुनाया। उन्होंने कहा कि पहला गीत ‘‘घर के छेकाई’ अपनी भाभी से सीखी थी। उन्होंने कहा कि लोकगीत सीखने की शुरुआत अपने आंगन से, भैंस पर सवार चरवाहे से, कलम-गाछी में घूमती लड़कियों से, हलवाहे एवं खेत में काम करने वाले किसानों से सीखा। पहली बार विद्यापति के गीत ‘‘जय जय भैरवी’ की रिकार्डिग के लिए मुम्बई गई तो जहीर अहमद खान ने कहा कि मैथिली क्लिष्ट भाषा है। इसकी रिकार्डिग नहीं होगी। इस पर मैंने कहा कि आप रिकार्डिग करें। यह बाजार में लोकप्रिय नहीं हुआ तो मैं जगह-जमीन बेचकर आपको भरपाई करूंगी। लेकिन जब वह गीत सुपर हिट हुई तो फिर मेरी प्रतिष्ठा बढ़ गई। उन्होंने अपने अन्य संस्मरण भी सुनाएं। आरंभ हृदय नारायण झा के स्वागत गान एवं भोजपुरी अकादमी के पूर्व अध्यक्ष चितरंजन प्रसाद सिन्हा के भोजपुरी स्वागत उद्बोधन से हुआ। मुंशी रघुनंदन दास रचनावली की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए लेखनाथ मिश्र ने कहा कि यह मैथिली में प्रथम महाकाव्य है और इसे पाठय़क्रम से हटाया जाना दुभाग्यपूर्ण है। डॉ. रमानंद झा रेणु ने रचनावली के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला। संयोजक भैरव लाल दास ने कहा कि शारदा सिन्हा के लोक गीतों की ताकत है कि बिहार के छठ पर्व को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप मिला। डॉ. बीके सिन्हा ने भी विचार रखे। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिवकुमार मिश्र ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य एवं कला प्रेमी उपस्थित थे।

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