बच्चों में तेजी से बढ़ रहा है अटेंशन डेफिसिट हाइपर ऐक्टिव डिस्ऑर्डर

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अटेंशन डेफिसिट हाइपर ऐक्टिव डिसऑर्डर एक प्रकार की मानसिक बीमारी है, जो बच्चों में होने की संभावना ज्यादा रहती है। ये डिसऑर्डर लड़कियों की तुलना में लड़कों में ज्यादा पाया जाता है। यह एक दिमाग से संबंधित विकार है, जो बच्चों को तो होता ही है, साथ ही साथ बड़े भी इस डिसऑर्डर से ग्रस्त होते हैं। यह तंत्रिका से जुड़ा हुआ विकार है, जो सीखने, ध्यान देने और व्यवहार पर अपना प्रभाव डालता है। इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति किसी भी चीज पर ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता है। राजधानी के प्रसिद्ध मनोरोग विशेषज्ञ तथा हितैषी हैपीनेस होम के निदेशक डॉ. विवेक विशाल बताते हैं कि इस बीमारी से ग्रस्त मरीज में बेचैनी, रोषपूर्ण व्यवहार, ध्यान का भटकना और अति सक्रियता जैसी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं। इसकी वजह से स्कूल जाने वाले बच्चों, स्कूल के कार्यो या घर के कामों में ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाता। यह बीमारी बचपन में होने वाली बीमारियों में से एक है। यह किशोरावस्था से लेकर वयस्कावस्था तक रह सकती है। डॉ. विशाल ने बताया कि एडीएचडी की पहचान के लिए बच्चों में इसके लक्षण सात साल की उम्र के पहले मौजूद होना चाहिए। इनके लक्षणों को सबसे पहले अभिभावक या स्कूल के शिक्षक को समझना चाहिए। जो बच्चे अपने घर या स्कूल में साधारण से कुछ अलग कर रहे हैं या उनके व्यवहार तथा प्रदर्शन में कुछ अलग दिख रहा है तो हो सकता है कि वह एडीएचडी की समस्या से पीड़ित हो। कई बच्चों में एडीएचडी से मिलते-जुलते हुए कुछ लक्षण दिखाई देते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता है कि वे भी एडीएचडी से पीड़ित हों। इसके लिए अभिभावक को बाल रोग विशेषज्ञ या मनोचिकित्सक से सलाह लेना चाहिए। इस बीमारी का पता लगाने के लिए मनोचिकित्सक कई ऐसे टेस्ट या परीक्षण करते हैं, जिनसे पता चल जाता है कि बच्चा इस बीमारी से ग्रस्त है। कभी-कभी एडीएचडी के साथ घबराहट और ऑटिज्म भी देखा जाता है, इसलिए इसके साथ बढ़ रही दूसरी समस्याओं के लिए भी मनोचिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है ताकि दूसरी समस्याओं का भी अच्छी तरह से आकलन किया जा सके। एडीएचडी के उपचार में थेरैपी काउंसलिंग या उपचारी शैक्षणिक प्रोग्राम सभी की जरूरत होती है।बीमारी का कारण तथा इलाज डॉ. विशाल बताते हैं कि एडीएचडी के प्रमुख कारणों का आज तक पता नहीं चला है, लेकिन कुछ कारण ऐसे हैं, जो इस बीमारी की वजह हो सकते हैं। जैसे – रासायनिक असंतुलन, आनुवंशिकता तथा पर्यावरणीय कारण। जो औरतें गर्भावस्था में धूम्रपान या शराब का सेवन करती हैं, उनके बच्चों में एडीएचडी से प्रभावित होने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा, घर में आंतरिक कलह, एकल पारिवार, मां-पिता दोनों के जॉब में होने से बच्चों की उपेक्षा आदि इसका सबसे बड़ा कारण है। इसके उपचार के लिए दवाओं का उपयोग, साइकोथेरेपी, संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी, पारिवारिक थेरेपी, सामाजिक कौशल परीक्षण तथा संतुलित खान-पान की मदद ली जाती है। कई बार लक्षणों की गंभीरता को देखते हुए बच्चों को अस्पताल में भर्ती भी कराने की जरूरत पड़ जाती है।

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कई बार लोग इसे सही ढंग से पहचान नहीं पाते तथा प्रारंभिक दौर में अमूमन यह सोच लेते हैं कि बच्चे तो शरारती होते ही हैं। बच्चों में इसके लक्षण इस प्रकार हैं – स्कूल या घर पर हर काम में लापरवाही करना या हमेशा गलतियां करते रहनाउ दिए गए आदेशों का पालन नहीं करना, उन्हें नहीं मानना या उन पर ध्यान नहीं देना
– किसी भी काम को ठीक तरह से नहीं कर पानाउ होम वर्क करना या अपने नोट बुक्स का भूल जानाउ कम उम्र में ही बातों को भूलने लगनाउ एक जगह टिक कर नहीं बैठना। थोड़ी-थोड़ी देर में बेचैन हो जाना उसंयम खो देना वयस्कों में भी इसके लक्षण प्रमुख हैं
– आसानी से ध्यान भटक जाना
-बातों को याद नहीं रख पाना
– टाल-मटोल करना
– थोड़ी-थोड़ी देर पर बेचैन हो जाना
– रिश्तों से जुड़ीं समस्याएं
– डिप्रेशन में रहना आदि

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