प्रतिवर्ष हजारों हेक्टेयर उपजाऊ मिट्टी बर्बाद

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पटना – मिट्टी से बनाई जाने वाली ईटों में प्रधानतया कृषि योग्य उपजाऊ उपरि – मृदा का उपयोग किया जाता है। ऐसी मृदा के उपयोग से कृषि प्रधान बिहार राज्य में आने वाले दिनों में कृषि उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका है। नतीजा यह है कि ईंट निर्माण में करीब 10,000 हेक्टेयर उपजाऊ उपरि मृदा प्रतिवर्ष समाप्त हो रहा है। इसका बेहद खराब प्रभाव अनाजों के उत्पादन पर पड़ रहा है। ये बातें बिहार राज्य प्रदूषण नियंतण्रपर्षद् के अध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार घोष ने शुक्रवार को ‘‘बिहार राज्य प्रदूषण नियंतण्रपर्षद एवं डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स’ के सहयोग से आयोजित ‘‘ग्रीटिंग द ब्रिक सेक्टर इन बिहार’ विषय पर आयोजित कार्यशाला में कही। उन्होंने बताया कि देश में कुल उर्जा उत्पादन का 73 प्रतिशत र्थमल पावर प्लाटों द्वारा उत्पादित किया जाता है। इस प्रक्रिया में ईंधन के रूप में कोयला का उपयोग किया जाता है, जिससे करीब 4 से 11 करोड़ टन फ्लाई ऐश उत्पादन होता है, जिसका निष्पादन एक बड़ी समस्या है। एक अनुमान के मुताबिक अभी कुल फ्लाई ऐश का करीब 14 प्रतिशत ही उपयोग किया जा रहा है। फ्लाई ऐश ईंटों की गुणवत्ता के आधर पर इसके उपयोग को प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है। पर्षद् के सहायक वैज्ञानिक पदाधिकारी डॉ. नवीन कुमार ने बताया कि ईंट निर्माण इकाईयों में न्यून – कार्बन उत्सर्जन के लिए प्रयास प्रारंभ करने वाला बिहार देश का पहला राज्य बना जब ‘‘लो कार्बन पाथवे’ के लिए राज्य सरकार द्वारा सन् 2012 में एक ‘‘टास्क फोर्स’ का गठन किया गया। पटना शहर के निकट के 5 ब्लॉकों के करीब 120 ईंट भटठों द्वारा अपने इर्ंट निर्माण तकनीक को स्वच्छतर तकनीक में परिवत्तिर्त कर लिया गया है तथा बिहार राज्य प्रदूषण नियंतण्रपर्षद् के आदेश के अनुसार 31 अगस्त 2018 तक स्वच्छतर तकनीक में इंर्ंट निर्माण को परिवत्तिर्त नहीं करने वाली इकाईयों को राज्य पर्षद् द्वारा सहमति प्रदान नहीं किया जायेगा। डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स की उपाध्यक्ष के. विजयलक्ष्मी ने बताया कि फ्लाई ऐश का निष्पादन एक बड़ी समस्या है। अत: राज्य के बड़े उपभोक्ताओं को मिट्टी से बनी ईंटो के बदले फ्लाई ऐश से बनी ईंटों के उपयोग को बढ़ाना चाहिए। ग्रीनटेक प्राइवेट लिमिटेड के डॉ. समीर मैतील ने कहा कि उनकी संस्था द्वारा किये गये अनुसंधन में यह पाया गया है कि स्वच्छतर तकनीक अपनाकर बनाये गये भठ्ठों से अच्छी गुणवत्ता के ईंट का निर्माण होता है तथा ईंधन के रूप में कोयले की खपत कम होती है। राज्य पर्षद् के सदस्य सचिव आलोक कुमार ने कहा कि फ्लाई ऐश ईंट उत्पादक इकाइयों द्वारा व्यापक प्रचार प्रसार एवं प्रदर्शनी लगाकर फ्लाई ऐश की गुणवत्ता के बारे में व्याप्त भ्रांति को दूर किया जा सकता है। कार्यशाला में एनटीपीसी, ग्रामीण विकास विभाग, पर्यावरण एवं वन विभाग, बिहार अर्वन इन्प्रफास्ट्रर डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड, बिहार मेडिकल सर्विसेज एण्ड इन्प्रफास्ट्रर कारपोरेश लिमिटेड आदि विभागों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बढ़ी एएसी ब्लॉक की मांग पटना। प्रदूषण के बढ़ते स्तर तथा स्वास्य पर इसके घातक प्रभाव को देखते हुए सरकार ने क्ले ब्रिक्स पर रोक लगाने का ऐलान कर दिया है। क्ले ब्रिक्स कुल प्रदूषण में 15 फीसदी का योगदान देती हैं, जिनके चलते हवा की गुणवत्ता का स्तर गिर जाता है। क्ले ब्रिक्स पर रोक लगाने के परिणामस्वरूप निर्माण कंपनियों तथा बिल्डरों पर दबाव बढ़ गया है। इस प्रतिबंध के बाद कई निर्माण परियोजनाओं का काम रुक गया है और लोग एएसी ब्लॉक्स की ओर रुख कर रहे हैं। यह उत्पाद निर्माण उद्योग में बदलाव लाएगा तथा सामाजिक, जलवायु परिवर्तन एवं ऊर्जा की चुनौतियों के समाधान के लिए सरकार की विभिन्न पहलों में अपना योगदान देगा। एएसी ब्लॉक का निर्माण फ्लाई ऐश (राख), सीमेंट, चूना, जिप्सम, पानी और एलुमिनियम (राइजिंग एजेंट) से किया जाता है। ये ब्लॉक वजन में हल्के होते हैं और बेहद प्रत्यास्थ एवं टिकाऊ भी होते हैं। 

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