पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र के निधन पर तीन दिन का राजकीय शोक

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पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र का सोमवार को गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे। उनका पार्थिव शरीर मंगलवार की दोपहर दिल्ली से पटना लाया जाएगा। इसके बाद पटना आवास पर लोगों के अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। डॉ. मिश्र काफी दिनों से बीमार चल रहे थे और उन्होंने सोमवार को अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके परिवार में तीन पुत्र तथा तीन पुत्रियां हैं। उनके एक पुत्र नीतीश मिश्र बिहार में मंत्री भी रहे हैं और इस समय भाजपा की प्रदेश इकाई में उपाध्यक्ष हैं। डॉ. मिश्रा का अंतिम संस्कार सुपौल जिले में उनके पैतृक गांव बलुआ बाजार में बुधवार को राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। बिहार सरकार ने उनके निधन पर तीन दिनों के राजकीय शोक की घोषणा की है। डॉ. मिश्र का पार्थिव शरीर उनके दिल्ली के द्वारका स्थित आवास पर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया है, जहां उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद, भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन तथा कई अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने उनके अंतिम दर्शन किए और उन्हें श्रद्धांजलि दी।

राज्यपाल फागू चौहान, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोजपा नेता एवं केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान, भाजपा सांसद रामकृपाल यादाव, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। डॉ. मिश्र कांग्रेस नेता के रूप में तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने केंद्र में भी मंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली थी। मुख्यमंत्री नीतीश ने दिवंगत आत्मा की चिर-शांति तथा उनके परिजनों एवं प्रशंसकों को दु:ख की इस घड़ी में धैर्य धारण करने की शक्ति प्रदान करने की ईर से प्रार्थना की है। डॉ. मिश्र के निधन पर बिहार में तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की गयी है। उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जायेगा।

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राज्यपाल ने यहां अपने शोक संदेश में कहा कि डॉ. मिश्र एक कुशल प्रशासक, संवेदनशील राजनेता और अर्थशास्त्र के विद्वान प्राध्यापक थे। उन्होंने तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री तथा केन्द्रीय मंत्री के रूप में पूरे देश एवं राज्य की अथक सेवा की। उनके निधन से पूरे देश, विशेषकर बिहार के राजनीतिक जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। उन्होंने दिवंगत नेता की आत्मा को चिरशांति तथा उनके परिवार के सदस्यों और प्रशंसकों को धैर्य-धारण की क्षमता प्रदान करने के लिए ईर से प्रार्थना की है। डॉ. मिश्र ने अपने करियर की शुरुआत बतौर लेक्चरर की। इसके बाद वह बिहार विविद्यालय में अर्थशास्त्र विषय के प्रोफेसर नियुक्त हुए। शिक्षण तथा पठन-पाठन एवं लेखन में उनकी रुचि जीवन के अंतिम दिनों में भी बरकरार रही। उन्होंने करीब 40 शोध-पत्र लिखे हैं तथा उनके मार्गदर्शन में 20 लोगों ने अर्थशास्त्र विषय में पीएचडी पूरी की है। इसके अलावा उन्होंने कई किताबें लिखीं और कई पुस्तकों का संपादन भी किया है।

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उनका जन्म 24 जून 1937 को सुपौल जिले के बलुआ बाजार गांव में हुआ था। मिश्र को केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी मंत्री पद की जिम्मेवारी सौंपी गई। वह पहली बार 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद वह 08 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 तक दूसरी बार और 06 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक मुख्यमंत्री पद की जिम्मेवारी संभाली। उनके भाई ललित नारायण मिश्रा की हत्या के बाद वह बिहार में कांग्रेस के शक्तिशाली नेता बनकर उभरे। श्री मिश्रा ने बिहार का मुख्यमंत्री रहते हुए कई ऐसे नीतिगत निर्णय लिए जिससे उनकी लोकप्रियता सातवें आसमान पर पहुंच गई थीं। उन्होंने 10 जून 1980 को अपने मंत्रिमंडल की पहली बैठक में उर्दू को बिहार की दूसरी राजकीय भाषा बनाने के लिए बिहार राज्य आधिकारिक भाषा अधिनियम में संशोधान करने के प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान की थी। उनके इस निर्णय ने मुसलमान समुदाय में उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ा दी कि उन्हें ‘‘मौलाना’ जगन्नाथ कहा जाने लगा था।

प्रेस की आजादी के लिए हमेशा मुखर रहे मिश्रा ने प्रेस पर लगाये गये प्रतिबंध को समाप्त करने के उद्देश्य से 31 जुलाई 1982 को भारतीय दंड विधान की धारा 292 और अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 455 को संशोधित करने के लिए बिहार विधानसभा में संशोधन विधेयक पेश किया था। श्री मिश्रा केंद्र सरकार में भी मंत्री रहे। एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र देकर पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार के नेतृत्व में गठित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गये। बाद में उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को भी छोड़ दिया और जदयू में शामिल हो गये। वर्तमान में वह किसी राजनीति दल से नहीं जुड़े हुए थे। उनके पठन-पाठन और लेखन में रुचि उन्हें जीवन के अंतिम समय में भी वैचारिक रूप से सक्रिय रखा। वह सामाजिक आर्थिक संस्थान से अंतिम समय तक जुड़े रहे।

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राजनीतिक जीवन में उनका नाम अविभाजित बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाले से भी जुड़ा। 30 सितंबर 2013 को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की झारखंड की राजधानी रांची स्थित विशेष अदालत ने चारा घोटाला मामले में 44 लोगों को दोषी करार दिया था। दोषी करार दिये जाने वालों में एक नाम श्री मिश्रा की भी था। इस मामले में उन्हें चार वर्ष के कारवास के साथ ही दो लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। 20 जुलाई 2018 को झारखंड उच्च न्यायालय उन्हें नियमित जमानत दे दी। वर्तमान में वह चारा घोटाले के तीन अलग-अलग मामलों में औपबंधित जमानत पर थे।

 

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