पितृ अनुष्ठान का सर्वप्रधान केन्द्र है फल्गु

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गया : अन्त: सलिला गया का फल्गु नदी कभी दूध की नदी कहलाती थी। इसी नदी से श्राद्ध का श्रीगणोश होता है। इस फल्गु नदी का काफी महत्व है। भारत भूमि पर प्रवाहमान पितृतारक फल्गु नदी का स्थान अक्षुण्ण है। कई अर्थों में गया तीर्थ के स्थापन और विकास में फल्गु की अविश्वसनीय भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता। सच कहा जाए तो प्राच्य काल में गया तीर्थ से जुड़े तानाबाना का प्रधान केन्द्र फल्गु ही था और आज भी फल्गु गया की जीवन रेखा है। साहित्यकार राकेश कुमार सिन्हा रवि ने बताया कि फल्गु की एक-एक बूंदे पितरों की अक्षय तृप्ति प्रदान करती है। गया की गंगा फल्गु माता सीता के श्राप से श्रापित हो अन्त:सलिल हो गई। कहतें हैं प्राच्यकाल में फल्गु दूध की नदी थी। पर एक कोप के बाद आशीर्बाद के पुन: वापसी से फल्गु सामान्य जल की नदी हो गई। फल्गु मूलत: संगम की नदी है। मोहाने और निरंजना में सरस्वती के सम्मिलनोंपरांत उद्गमित धारा ही फल्गु के नाम से विश्व प्रसिद्ध है। फल्गु में कभी 52 घाट थे। पर, आज इनकी संख्या घटी है। आज यहां श्मशान घाट, अहिल्याबाई घाट, देवघाट, संगत घाट, गायर्त्ी घाट, ब्रह्मणी घाट, पितामहेश्वर घाट, महादेव घाट, सिढ़ियाघाट, मौर्या घाट, पंचायती आखाड़ा, रामशीला घाट प्रमुख है। अस्तु गया के पितृ अनुष्ठान का सर्वप्रधान केन्द्र है फल्गु जहां से गया श्राद्ध का श्रीगणोश होता है।

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