निर्णय हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं, कई मसलों से संतुष्ट नहीं-जफरयाब जिलानी

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पांच जजों की संवैधानिक पीठ के संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में फैसला आते ही मुस्लिम पक्ष की पहली प्रतिक्रिया सामने आ गई है। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने कहा कि पूरा फैसला पढ़ने के बाद आगे की रणनीति तय करेंगे।

अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से जफरयाब जिलानी ने उसके सम्मान की बात करते हुए कहा कि विवादित जमीन को हिंदू पक्षकारों को दिए जाने से खासी निराशा जाहिर करते हुए कहा कि वह सर्वोच्च अदालत के फैसले को पूरा पढ़ने के बाद ही तय करेंगे कि पुनर्विचार याचिका दायर की जाए या नहीं. उन्होंने कहा कि मस्जिद की कोई कीमत नहीं हो सकती. इसके साथ ही उन्होंने दोनों पक्षों से शांति और सौहार्द्र बनाए रखने की बात करते हुए कहा कि अदालत ने देश के पंथनिरपेक्ष ताने-बाने को बरकरार रखा है. कुछ मसलों पर हमें आपत्ति है, लेकिन पूरा फैसला पढ़ने के बाद ही ही इस बारे में अंतिम तौर पर आगे का रास्ता तय करेंगे.

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद जफरयाब जिलानी ने कहा कि जिस संवैधानिक व्यवस्था के तहत विवादित जमीन को लिया गया है, उससे वह संतुष्ट नहीं हैं. हालांकि उन्होंने जोर देकर कहा कि फैसला पूरा पढ़ने के बाद ही वह इस बारे में कोई अंतिम निर्णय करेंगे. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत ने देश के पंथनिरपेक्ष ढांचे को बरकरार रखते हुए साफ कर दिया है कि यहां हर धर्म बराबर हैं. उन्होंने कहा कि कहीं और 5 एकड़ जमीन मस्जिद दिए जाने की बात हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है. फिर भी हम अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं. गौरतलब है कि सर्वोच्च अदालत के फैसले से पहले वह कहते आए थे कि उन्हें फैसला स्वीकार होगा और वह उसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करेंगे.

संविधान पीठ ने कहा कि पुरातात्विक साक्ष्यों को सिर्फ एक राय बताना भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रति बहुत ही अन्याय होगा। न्यायालय ने कहा कि हिन्दू विवादित भूमि को भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं और मुस्लिम भी इस स्थान के बारे में यही कहते हैं। हिन्दुओं की यह आस्था अविवादित है कि भगवान राम का जन्म स्थल ध्वस्त संरचना है। पीठ ने कहा कि सीता रसोई, राम चबूतरा और भंडार गृह की उपस्थिति इस स्थान के धार्मिक होने के तथ्यों की गवाही देती है। शीर्ष अदालत ने साथ ही यह भी कहा कि मालिकाना हक का निर्णय सिर्फ आस्था और विश्वास के आधार पर नहीं किया जा सकता कानूनी अधार पर ही निर्णय लिया गया है।

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