ध्रुवों में बंटा समूह G20

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G20 के इस मंच पर दो ध्रुव दिखे। एक धुरी अमेरिका-जापान की दिखी, जिसके करीब यूरोपियन यूनियन थी। दूसरी धुरी चीन-रूस की थी, जिसके खिलाफ अमेरिका और यूरोपियन यूनियन थे। अमेरिका-जापान हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन को घेरते दिखे तो चीन-रूस मध्य-पूर्व में अमेरिकी वर्चस्ववाद के खिलाफ लगे थे
सोवियत-पतन के पश्चात जब दुनिया एकध्रुवीय हुई तो अमेरिकी नेतृत्व वाले पूंजीवादी विश्व ने यह समझे बिना कि इसके भविष्य में क्या परिणाम आएंगे, एकाधिकारवादी व्यवस्था को थोपना शुरू किया। इसके दुष्प्रभाव देखे भी गये, लेकिन इसमें कोई बदलाव नहीं आया। लेकिन 2008 में जब पूंजीवाद की दीवारें अमेरिका से गिरनी शुरू हुई तो पूंजीवादी दैववाद ने खुद को बदलना शुरू कर दिया। इसके बाद पूंजीवादी विश्व धीरे-धीरे संरक्षणवाद की ओर बढ़ा। इस संरक्षण का ही परिणाम है कि बर्लिन दीवार के लगभग तीन दशक बाद डोनाल्ड ट्रंप एक दीवार फिर बनाना चाहते हैं। इसका असर अब उस जी-20 पर भी दिख रहा है, जिसके झण्डे के नीचे 20 देश खुद को दुनिया का नेता मानकर चल रहे थे। जी 20 के ब्रिस्बेन सम्मेलन से लेकर ओसाका तक को देखें तो इनकी एकता बिखरती हुई दिख रही है और ये जाने-अनजाने दुनिया को संरक्षणवाद, राष्ट्रवाद के साथ नये टकरावों की ओर धकेलते दिख रहे हैं। ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि भारत किस ट्रैक को अपनाए?शिखर सम्मेलन की शुरुआत में ही जापान के प्रधानमंत्री ¨शजो अबे ने सदस्य देशों से समझौते की तैयारी को प्रदर्शित करने का आह्वान किया था, जिसमें उनका इशारा जी-20 देशों के बीच व्याप्त मतभेदों पर जोर देने के बदले सहमतियां ढूंढ़ने पर बल दे रहे थे। लेकिन ट्रंप ने ओसाका पहुंचने से पहले कई सदस्य देशों की आलोचना की। जापान की सैन्य कमजोरी की वजह से, जर्मनी को कम सैन्य बजट की वजह से, चीन को कारोबारी बाधाओं की वजह से और भारत की ऊंचे टैरिफों की वजह से काफी खरी-खोटी सुनाई। इसलिए जी-20 के शुरू होने से पहले ही यह स्पष्ट हो चुका था कि इस सम्मेलन में उस तरह की एकता नहीं दिखनी है, जिसके उद्देश्य से इसका गठन किया गया था। वही हुआ भी। एक बात और भी रही यूरोपियन यूनियन के साथ-साथ ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरिसा मे ने रूस को सीधे निशाने पर लिया, जो एक नए टकराव का संकेत है। इस मंच पर दो ध्रुव भी देखने को मिले। इसमें एक धुरी अमेरिका और जापान की दिखी, जिसके करीब यूरोपियन यूनियन थी। दूसरी धुरी चीन और रूस की दिखी जिसके खिलाफ कमोबेश अमेरिका और यूरोपियन यूनियन दोनों ही दिखे। अमेरिका और जापान मिलकर हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन को घेरने की रणनीति को आगे बढ़ाते दिखे तो चीन और रूस मध्य-पूर्व में अमेरिकी वर्चस्ववाद के खिलाफ रणनीति बनाते हुए। भारत के सामने कूटनीति संतुलन साधने का एक धर्म संकट था और यह शायद भारतीय विदेश नीति का स्थायी संकट भी है क्योंकि भारत अमेरिका से यदि दूरी नहीं बना सकता तो फिर वह रूस और चीन के साथ भी टकराव नहीं ले सकता। इसलिए भारत ने वहां पर यह प्रदर्शित करने की कोशिश की कि वह अमेरिका के साथ तो है, लेकिन चीन विरोधी खेमे का हिस्सा नहीं है। इसे स्पष्ट करने के लिए नरेन्द्र मोदी ने एक तरफ शिंजो अबे और डोनाल्ड ट्रंप के साथ भारत-अमेरिका-जापान (स्ट्रैटेजिक ट्रैंगल) को मजबूत करने पर बल दिया तो दूसरी तरह रूस-भारत-चीन (आरआइसी; रिक) की शीर्ष बैठक के साथ-साथ ब्रिक्स के राष्ट्राध्यक्षों की अलग बैठक में भी हिस्सा लिया। भारत ने अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर रणनीतिक चतुभरुज का निर्माण किया है, लेकिन इसका एक छुपा हुआ उद्देश्य चीन को हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में घेरना है। इस वजह से भारत इस पर अत्यधिक सक्रियता नहीं दिखा रहा है, लेकिन पिछले वर्ष भी शिंजो एबे और ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस ट्रैंगल को मजबूत सामरिक रिश्तों को ताकत देने की कोशिश की थी। हां, भारत यह अवश्य चाहता है कि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन की गतिविधियां सीमित रहें अन्यथा वे भारत के लिए सीधी चुनौती भी बन सकती हैं। इसलिए भारत के लिए यह जरूरी है कि वह सक्रियता के साथ संतुलन की रणनीति बनाए। यही वजह है कि उसने अमेरिका व जापान के विपरीत ‘‘रिक’ में मुख्य रूप से नियंतण्र स्तर पर मिल रहे मंदी के संकेतों और व्यावसायिक संरक्षणवादी नीतियों को मिल रहे प्रश्रय सम्बंधी मुद्दे को वरीयता दी। कुल मिलाकर जी-20 संगठन जो आकार और संसाधनों की बदौलत दुनिया को बेहतर दिशा दे सकता था परन्तु अब ऐसा नहीं हो रहा। यह खेमों में विभाजित होता एक मैदान सा दिख रहा है, जिसके परिणाम बहुत अच्छे आने की संभावना कम है।

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