त्रिदिवसीय विरासत नाटय़ महोत्सव 2019 का आगाज

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त्रिदिवसीय विरासत नाटय़ महोत्सव 2019 और नाटय़ संस्था ‘‘सूत्रधार’ के 40वें पल्लवन दिवस समारोह का आरम्भ शनिवार को हर्ष और उल्लास के साथ हुआ। कार्यक्रम का आगाज लोक कलाकारों ने गीत-‘‘ओही देसवा में घर मोर भइया नाम बारे हिन्दुस्तान हो’ की प्रस्तुति से किया। कार्यक्रम के पहले दिन कई गणमान्य अतिथियों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों व वरिष्ठ कलाकारों का जमावड़ा लगा रहा। ‘‘सूत्रधार’ द्वारा आयोजित इस नाटय़ोत्सव का उद्घाटन अनिल सुलभ, विनोद श्रीवास्तव, देवमुनि सिंह, दीनानाथ यादव, डॉ बीएन विश्वकर्मा आदि ने दीप प्रज्वालित कर किया। अतिथियों का स्वागत करते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी व आयोजक एवं सूत्रधार के महासचिव नवाब आलम ने कहा कि मुझे बहुत खुशी है कि मेरे छोटे से दरख्वास्त पर सभी गणमान्य मंत्री, नेता आदि यहां पहुंचे। उन्होंने बताया कि भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने एक भरोसे के तहत ‘‘सूत्रधार’ के लिए इस काम को सम्पन्न करने की जिम्मेवारी तय की है। महोत्सव के पहले दिन ‘‘सूत्रधार’ द्वारा चर्चित नाटककार विजय बिहारी रचित एवं उदय कुमार द्वारा निर्देशित नाटक ‘‘काठ का उल्लू’ का मंचन किया गया। नाटक खोखली होती शासन व्यवस्था और छिन्न-भिन्न होती सामाजिक समरसता को दर्शाता है। पल-पल रंग बदलते इंसान, सत्ता के चरित्र, सत्तालोलुपता और निजी स्वार्थ में अंधे होकर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की साजिश, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, के भेदभाव में दम तोड़ती मासूमियत आदि के दृश्य एक तल्ख सच्चाई बयां करते हैं। सत्ता पाने की होड़ में जहां एक ओर मजबूत सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने की नापाक कोशिश की जा रही है वहीं दंगे-फसाद की आग में इंसानियत को खाक में मिलाया जा रहा है। दूसरी तरफ इसी आग पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं।

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नाटक में जीवन की सांझ यानी बुढ़ापा, जब शरीर की शक्ति कम होने लगती है, आंखों की रौशनी मद्धिम पड़ने लगती है, तब जरूरत महसूस होती है सहारे की। बुढ़ापे में माता-पिता अपने बच्चों से सहारे की आस लगाए रहते हैं। पर बच्चे अपने मां-बाप के जीवन की संध्या बेला में सहारा देने की बजाए मुंह फेर लेते हैं, असहाय छोड़ देते हैं तब बूढ़े मां-बाप के मन पर जो ठेस पहुंचती है उसी को दर्शाता है यह नाटक।

 

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