तीन मार्च के बाद शुरू होगा सीटों की दावेदारी का खेल

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एनडीए अपनी एकजुटता को लेकर भले कसीदे गढ़ रहा हो मगर आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर चिह्नित दलों के चिह्नित उम्मीदवारों को लेकर संशय कुछ कम नहीं है। सूत्र बताते हैं कि यह संशय इस कदर हावी है कि एनडीए का हर दल इस सवाल का जवाब तीन मार्च 2019 को होने वाली एनडीए की महारैली के पहले दे पाने में असमर्थ है। यह तय है कि 17-17 सीटों पर जदयू व छह सीटों पर लोजपा की चुनावी रणभेरी बजने वाली है। मगर सारा बवाल चिन्हित सीटों को लेकर है। भाजपा रणनीतिकारों की मानें तो जीती हुई 22 सीटों में भाजपा छह सीटों पर आास्त है। भाजपा अररिया व कटिहार में से एक पर लड़ना चाहती है। संशय वाली जो सीटें हैं उनमें पटना साहिब व पाटलिपुत्र लोकसभा में से एक, आरा व काराकाट, उजियारपुर व सीतामढ़ी, बेगूसराय व मुंगेर, सासाराम व गोपालपुर में से एक-एक सीट पर जदयू व भाजपा की हिस्सेदारी साबित होने वाली है। यानी कुल 13 सीटों को लेकर भाजपा एक तरह से आास्त है। अभी भी भाजपा को चार कौन सी लोकसभा सीटों पर लड़ना है यह जदयू व लोजपा के रणनीतिकारों के साथ बैठकर तय होने वाला है। वैसे भाजपा की निगाहें जहां टिकी हैं उनमें विशेष तौर पर वाल्मीकि नगर, दरभंगा, नवादा, मुजफ्फरपुर आरा, शिवहर, औरंगाबाद लोकसभा सीटें शामिल हैं। लेकिन इन सारी समस्याओं का हल तीन मार्च के बाद ही निकल पायेगा। ऐसा इसलिए भी कि कुछ सीटों पर जहां भाजपा व लोजपा के बीच टकराहट है तो कुछ सीटों पर जदयू की दावेदारी। र्चचा यह है कि लोजपा की उलझन नवादा, वैशाली व खगड़िया सीटों को लेकर बनी हुई है। वैशाली से लोजपा सांसद रामा सिंह ने संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष चिराग पासवान के विरुद्ध आवाज उठाकर अपनी मंशा प्रकट कर दी है। मुंगेर से लोजपा की सांसद मुंगेर सीट को लेकर अड़ी हुई हैं। खगड़िया से लोजपा सांसद चौधरी महबूब अली कैसर की कांग्रेस की बढ़ती नजदीकियां लोजपा के लिए परेशानी का सबब बन गई है। वहीं दूसरी ओर जदयू विशेष तौर पर भाजपा की जिन जीती हुई सीटों पर दावेदारी कर रही है उनमें दरभंगा, पटना साहिब, पाटलिपुत्रा, बेतिया, झंझारपुर, सीवान, महाराजगंज, मुजफ्फरपुर शामिल है। पटना साहिब से शत्रुघ्न सिन्हा की बेरुखी तो दरभंगा से सांसद कीर्ति आजाद की नाराजगी है। सांसद भोला सिंह के निधन से बेगूसराय लोकसभा की परेशानी बढ़ गई है। तीन मार्च को एनडीए की महारैली के बाद इन सभी समस्याओं का निदान ढूंढ़ते जीत का स्वस्थ समीकरण तलाशा जाना एनडीए रणनीतिकारों की प्राथमिकता होने जा रही है।

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