झारखंड राज्य अपनी स्थापना के अठारह वर्ष पूरा कर रहा है………

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झारखंड राज्य अपनी स्थापना के अठारह वर्ष पूरा कर रहा है. अपने गठन के बाद से हीं राज्य कई तरह की समस्याओं से जूझता रहा, खासकर उग्रवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, एवं बेरोजगारी, इत्यादि. एक समय ऐसा भी आया जब लगा की नए राज्य की स्थापना से झारखंड एवं इसके लोगों को उनका अपेक्षित हक नहीं मिल पा रहा. ऐसे में राज्य एवं राजनेताओं के समक्ष यह चुनौती है कि लोगों में विश्वास जगा सके एवं झारखंड विकास के नए पथ की ओर अग्रसर हो सके.
यह कहना जल्दबादी होगी कि झारखंड राज्य की स्थापना जिस परिकल्पना के साथ हुई थी उसे वह पा चुकी है. लेकिन, इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता की पिछले कुछ वर्षों में राज्य विकास की ओर अग्रसर हुआ है. भले ही वर्तमान सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की गति धीमी रही हो एवं इसका लाभ सभी तक न पहुंच पाया हो या वर्ग-विशेष इससे वंचित रह गया हो, जमीनी स्तर पर लोगों तक सरकार के कार्यों एवं नीतियों का लाभ पहुंचा है एवं उनके जीवन में गुणात्मक परिवर्तन आया है, जो राज्य के लिए शुभ संकेत है, बावजूद इसके की सरकार के ज्यादातर दावे कागजों एवं आंकड़ो में हीं दिखाई पड़ते हैं जिसे धरातल पर उतारना अभी भी बाकी है.
यद्यपि वर्तमान सरकार को उग्रवाद, नक्सलवाद, भ्रस्टाचार, एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं पर पूरी तरह से सफलता नहीं मिल सकी है एवं ये समस्याएं समय-समय पर विकास की गति को प्रभावित करती रहती हैं, मगर सरकार की नीतियों एवं प्रयासों के कारण आज ज्यादातर गावों तक सरकार के कार्यक्रमों का लाभ लोगों तक पहुंचा है.
खासकर स्वच्छता अभियान के तहत शौचालयों का निर्माण, बिजली, पानी, शिक्षा, एवं स्वास्थ्य जैसे सुविधाओं में तुलनात्मक सुधार हुआ है. हालांकि, अभी भी उनमें गुणात्मक सुधार की आवश्यकता है. खासकर शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में जहां राज्य अभी भी आधारभूत सरंचना एवं मानव संसाधन जैसे मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा हो.
वर्ष 2014, 2015, एवं 2016 की ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी रिपोर्टों के अनुसार, झारखंड में स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे और मानव संसाधनों की कमी एक बड़ी समस्या रही है. उप-स्वास्थ्य केंद्रों में 35 प्रतिशत, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 66 प्रतिशत और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 22 प्रतिशत बुनियादी ढांचों की कमी है, जिससे लोगों तक समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं. हालांकि, नीति आयोग द्वारा जारी की गयी ‘प्रगतिशील भारत, स्वस्थ्य राज्य’ 2018 रिपोर्ट में 6.87 स्कोर के साथ झारखंड सूची में सबसे ऊपर है, ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़े 2018 के रिपोर्ट बताते हैं की झारखंड में एक भी स्वास्थ्य उप-केंद्र एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भारतीय सार्वजानिक स्वास्थ्य मानक (इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड) के मानकों के अनुसार कार्य नहीं कर रहा.
आज भी 53 प्रतिशत स्वास्थ्य उप-केंद्रों में नियमित पानी की व्यवस्था एवं 66 प्रतिशत स्वास्थ्य उप-केंद्रों में बिजली की व्यवस्था नहीं है. तैंतालीस प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बिजली एवं 45 प्रतिशत में नियमित पानी की व्यवस्था नहीं है. साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रो में कुपोषण गंभीर चिंता का विषय है. वर्ष 2016 में, झारखंड में 47.8 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट (अपनी आयु से कम वजन) थे.
वर्ष 2006-2016 के दौरान, झारखंड में एनीमिया में सबसे कम (70.3 प्रतिशत से 69.9 प्रतिशत) गिरावट दर्ज की गयी. हाल के झारखंड के पोषण संबंधी आंकड़े, गर्भवती महिलाओं और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में एनीमिया का उच्च प्रसार दिखाते हैं. इन आंकड़ों के अनुसार 62 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं और 6-49 महीने के लगभग 70 प्रतिशत बच्चे रक्ताल्पता या कुपोषण (एनीमिया) के शिकार हैं. ऐसे में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य की ओर ध्यान एवं स्वास्थ्य सुविधाओं में मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है.
प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा, सभी स्तरों पर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है, जहां राज्य शिक्षकों एवं आधाभूत सरंचनाओं की कमी से जूझ रहा है. हालांकि, प्राथमिक शिक्षा में सुधार हेतु, कम छात्रों वाले नजदीकी विद्यालयों का विलयन जैसे कदम उठाये जा रहे है, ताकि शिक्षकों की कमी जैसी समस्याओं को दूर किया जा सके. लेकिन ये प्रयास नाकाफी हैं, जहां भी आज बड़ी संख्या में प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है. कक्षा पांच तक के विद्यालय एक या दो शिक्षकों पर निर्भर है.
जो शिक्षक हैं भी, उनका ज्यादातर समय मिड-डे मिल एवं अन्य कार्यक्रमों के समन्वयन में चला जाता है. उच्च शिक्षा का हाल भी बहुत अलग नहीं है, जहां एक दशक से शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई है. ज्यादातर कॉलेज शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं. राज्य सरकार द्वारा उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना सराहनीय कदम है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि ऊंची फीस के कारण इन निजी विश्वविद्यालयों का फायदा सिर्फ उच्च एवं मध्यवर्ग के लोग हीं उठा सकेंगे. ऐसे में गुणवतापूर्ण उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मौजूदा सरकारी संस्थानों को ज्यादा धन एवं संसाधनों से सुदृढ़ करने की जरूरत है.
झारखंड राज्य की धीमी विकास में अकुशल नेतृत्व एवं भ्रस्टाचार एक बड़ा कारण रहा है. राज्य सरकार के ‘भ्रष्टाचार मुक्त झारखंड’ के संकल्प के बावजूद भ्रष्टाचार आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है, जो राज्य के विकास में बाधक है. झारखंड के पिछड़ेपन का दूसरा बड़ा कारण धीमी विकास दर रहा है.
पिछले दशक के मध्य में जब भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी से वृद्धि हुई, झारखंड एवं छत्तीसगढ़ जैसे कम आय वाले राज्यों में विकास की दर 2005 के बाद भी धीमी रही. हालांकि, पिछले दशक में झारखंड में गरीबी में तेज गिरावट देखी गयी है, विकास की गति धीमी रही है. आज भी, राज्य में गरीबों की संख्या सबसे ज्यादा है. ऐसे में यह जरूरी है कि राज्य सरकार नीतिगत फैसलों को जमीन पर उतारने पर जोर दे.
बेरोजगारी की समस्या को लेकर यह सरकार सजग दिख पड़ती है, परंतु सरकार के प्रयासों के बावजूद बेरोजगारी की समस्या बनी हुई है.
पिछले दो वर्षों में राज्य सरकार के द्वारा एक लाख से ज्यादा नियुक्तियां का दावा किया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इनमें से ज्यादातर लोगों को अभी भी नियुक्तियां नहीं मिली हैं या मनोनुकूल न होने के कारण लोगों ने उन नौकरियों को नहीं लिया. ऐसे में बेरोजगारी से निपटने के लिए राज्य स्तरीय नीति-निर्धारण की आवश्यकता है. कई संस्थानों एवं विभागों में वर्षो से बहाली नहीं हुई है.
झारखंड की दूसरी बड़ी समस्या लोगों के बीच में सामाजिक समरसता की कमी रही है, खासकर आदिवासी एवं गैर आदिवासियों के बीच एवं आदिवासियों (सरना धर्मावलंबी एवं इसाई आदिवासियों) के बीच धर्म के आधार पर आपसी वैमनस्य. राज्य के लोगों, प्रबुद्ध-जनों एवं नेताओं को यह समझने की जरूरत है कि ये तत्व राज्य के विकास में बाधक हैं. ये महज कुछ व्यक्तियों के द्वारा अपने निजी हित एवं राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए समय-समय पर किया जाता रहा है, जिससे सचेत होने की जरूरत है. शायद तभी हम ‘सुखी एवं स्वस्थ झारखंड’ के सपने को पूरा कर पायेंगे.
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