जिन्ना पर सियासत

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अलीगढ़ मुस्लिम विविद्यालय में मो. अली जिन्ना की तस्वीर पर विवाद हो गया है। यह बात सभी जानते हैं कि जिन्ना अविभाजित भारत के नागरिक और तेज-तर्रार अधिवक्ता रहे थे। जीवन के इस हिस्से में उनका सहयोग बिना किसी भेदभाव के देश के सभी वर्ग के लिए उपलब्ध रहा। अलबत्ता, वह बाद में मुसलमानों के लिए पाकिस्तान की मांग के पैरोकार हो गए। उनकी पहल पर भारत का विभाजन होकर एक नया देश पाकिस्तान बना और वे वहां के कायदेआजम कहलाए। इस तरह जिन्ना भारत के लिए खलनायक मान लिये गए। तभी से औसत भारतीय जनमानस में उनका नाम ही बंटवारे या कहिये कि देशद्रोह का मुहावरा हो गया है। वैसे ही जैसे विभीषण को बंधु-द्रोह का पर्याय माना जाता है। लोग अपने बच्चों का नाम विभीषण रखने से भी परहेज करते हैं। जिन्ना के संदर्भ में भी कमोबेश इसी तरह का माहौल है। लेकिन इस ताजा विवाद में बहुत सारी बातें बिसरा दी गई हैं, यहां तक कि इतिहास, उसके अध्ययन की आवश्यकता, सीख-सबक के लिए अतीत की विरासत संभालने की तहजीब भी, जो अनुचित हैं। पहली बात यही कि जिन्ना की जिस तस्वीर को मुद्दा बनाया जा रहा है, वह एएमयू के छात्र संघ के दफ्तर में 1938 से टंगी है। वहां गांधी की फोटो भी लगी है। तस्वीरों की पांत में गंगा-जमुनी संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता का पूरा समादर किया गया है। देखिये कि यह काम छात्र संघ के दफ्तर तक में हो रहा है। एएमयू केंद्रीय विविद्यालय है और उसकी पूरी कार्यपण्राली भारतीय संविधान के तहत संचालित हो रही है। जिन्ना की वहां लगी तस्वीर का यह मतलब नहीं है कि वहां पाकिस्तान सरकार की हुकूमत चलने लगी है या उसके छात्र जिन्नावादी हो गए हैं। ऐसा कोई साक्ष्य भी नहीं है। दूसरी बात, जिन्ना भारतीय इतिहास के अहम किरदार हैं। चाहे उनकी आलोचना घृणा की हद तक की जाए, वे रहेंगे भारतीय इतिहास का जीवंत हिस्सा बन कर। वैसे ही, जैसे ‘‘हिन्दू’ भगत सिंह, महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू, पाकिस्तान की स्मृतियों की धड़कन में हैं। इनके समेत बहुत सारे स्वाधीनता सेनानियों की स्मृतियां वहां सुरक्षित हैं। ये बताती हैं कि फिर से वे हालात न बनने देने के लिए मौजूदा या भावी पीढ़ियों को क्या क्या-क्या बचा कर चलना लाजिमी है। वे विभाजन की संभावित स्थितियों के पूर्व सचेतक हैं। उनका इसी रूप में विवेकसम्मत इस्तेमाल कीजिए। लेकिन ताजा प्रकरण इसकी तरफ पीठ किये, निहित स्वार्थ की बलि चढ़ने के लिए बेताब है।

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