जयंती पर विशेष : अक्खड़ बिहारी, कट्टर राष्ट्रवादी थे श्रीकृष्ण सिंह

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महान स्वतंत्रता सेनानी, विद्वान राजनेता, युगपुरु ष बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह संसदीय लोकतंत्र के शिल्पी, विकास स्तंभ, अक्खड़ बिहारी एवं कट्टर राष्ट्रवादी थे। बिहार के जीवन पर्यन्त मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनकी सोच का मूल्यांकन राष्ट्रीय संदर्भ में अपेक्षित है। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रतीक थे। इसके कुछ पहलू काफी प्रासंगिक हैं, मुंगेर जिला बोर्ड के 1924 में हुए चुनाव में कांग्रेस की भारी मतों से जीत हुई और श्रीबाबू सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गये लेकिन उन्होंने शाह मुहम्मद जुबैर साहब को अपना बड़ा भाई मानते हुए मो जुबैर साहब को अध्यक्ष का पद सौंप, खुद उपाध्यक्ष का पद स्वीकार किया। उसी ढंग से 1926 में मुंगेर जिले में जब साम्प्रदायिक दंगे भड़के तो श्रीबाबू ने शाह मुहम्मद जुबैर साहब के साथ हिन्दू-मुस्लिम तनाव समाप्त करने के उद्देश्य से दंगा पीड़ित क्षेत्रों का सघन दौरा किया जिसके कारण हिन्दू-मुस्लिम के बीच सौहार्द कायम हो सका जो आज तक कायम है। सच है कि उस घटना के बाद से आज भी मुंगेर में हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई के रूप में रह रहे है और कभी कोई दंगा नहीं हुआ। श्रीबाबू अदम्य साहसी थे चूंकि 1906 में जब श्रीबाबू मैट्रिक के छात्र थे तभी मुंगेर के कष्ट हरणी घाट पर अपने क्रांतिकारी बंगाली गुरु के सामने गंगा में प्रवेश कर एक हाथ में गीता और दूसरे हाथ में कृपाण लेकर शपथ ली की जब तक भारत माता को अंग्रेजों से स्वतंत्र नहीं करा देंगे, तब तक चैन की सांस नही लेंगे और उसी समय से श्रीबाबू देश के आजादी के लिए काम में लग गये। यह भी सच है की राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर 1930 में अस्वस्य रहने के बावजूद भी मुंगेर से गढ़पुरा (बेगूसराय) में लगभग 40 मील पैदल चलकर श्रीबाबू नमक बनाने पहुंच गये। पैदल चलने के कारण इनके पैरो में छाले पड़ गये थे पर इसकी परवाह किए बिना नियत समय पर उन्होंने कड़ाह को आग पर रखा और जैसे ही पानी खौलने लगा एसडीओ अय्यर के नेतृत्व में पुलिस उन पर बाज की तरह टूट पड़ी पर श्रीबाबू कड़ाह को अपने हाथों से पकड़े रहे। इतना ही नहीं कड़ाह को उन्होंने अपनी छाती से रोक दिया जिसके कारण उनके हाथ और छाती पर बड़े-बड़े फफोले निकले आये। राष्ट्रीय स्तर पर इतने बड़े साहसी नेता का बेमिसाल उदहारण है।डॉ. श्रीकृष्ण सिंह समाज सुधारक भी थे। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने देश में सर्वप्रथम स्थायी बंदोबस्ती की जमींदारी व्यवस्था को 1950 में ही समाप्त कर डाला जिसके कारण सामाजिक विषमता एवं आर्थिक शोषण का तंत्र बिहार में ध्वस्त हो सका। श्रीबाबू ने दलित समाज के आर्थिक,शैक्षणिक एवं सामाजिक उत्थान के लिए कई प्रभावी कदम उठाये। दलित समाज को सामाजिक मान्यता एवं समाज के मुख्य धारा में लाने के प्रयास के तहत पंडित विनोदानंद झा के साथ देश के बहुत ही प्रसिद्ध धार्मिक मंदिर बैद्यनाथ धाम में 27 सितम्बर 1953 को उन्होंने दलितों को मंदिर में प्रवेश दिलाने के लिए स्वयं नेतृत्व किया। कल्याण विभाग की स्थापना कर दलित छात्रों की शिक्षा,उनके तकनीकी प्रशिक्षण की नि:शुल्क सुविधा एवं विशेष छात्रवृत्ति की व्यवस्था श्रीबाबू ने की।आदिवासियों की समस्या को जानने के लिए दुर्गम पहाड़ी पर भी बसे पहाड़िया जाति के गांवों का उन्होंने दौरा किया। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने ग्रामीण जलापूर्ति के लिए स्वीकृत धनराशि में से दलितों एवं आदिवासियों के लिए विशेष राशि सुरक्षित करवायी। आदिवासियों की समस्याओं की गहन समीक्षा हेतु रांची में जनजातीय शोध संस्थान की स्थापना की उन्होंने करवायी । स्वाधीनता के पश्चात शीघ्र ही श्रीबाबू ने बिहार ग्राम पंचायत कानून,1947 का विधिवत निर्माण किया जो इस देश का सर्वप्रथम कानून बना। इस तरह श्रीबाबू का व्यक्तित्व का बहुत बहुआयामी है जो आज काफी प्रासंगिक है।

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