जम्मू-कश्मीर के पहले IAS टॉपर ने ट्वीट में लिखा रेपिस्तान, हो सकती है कार्रवाई

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जम्मू कश्मीर के पहले UPSC टॉपर शाह फैसल मुश्किलों में फंस गए हैं. रेप-कल्चर को लेकर ट्वीट करना उन्हें भारी पड़ सकता है. केन्द्र सरकार ने शाह फैसल के खिलाफ जम्मू-कश्मीर सरकार को अनुशासनात्मक कार्रवाई करने को कहा है.

कुछ दिन पहले शाह ने रेप की बढ़ती घटनाओं पर ट्वीट किया था. उन्होंने लिखा था. ‘पितृसत्ता + जनसंख्या + निरक्षरता + शराब + पोर्न + टेक्नालॉजी + अराजकता = रेपिस्तान!’

मंगलवार को जब फैसल के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश दिए तो उन्होंने अपना गुस्सा ज़ाहिर किया. न्यूज़ 18 से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी नौकरी जाने कोई डर नहीं है. उन्होंने कहा, “मेरी नौकरी जा सकती है. लेकिन दुनिया संभावनाओं से भरी है.”

फैसल कहते हैं, “सरकारी अधिकारी की एक छवि है. वो गुमनाम हैं, उन्हें बहस नहीं करनी है, उनके चारों ओर जो कुछ भी हो रहा है वो उसे देख कर अपनी आंखें बंद कर लें. लेकिन इसे अब बदलने की जरुरत है.”

मंगलवार को शाह फैसल ने एक और ट्वीट किया. इस ट्वीट के साथ उन्होंने वो लेटर भी शेयर किया है, जिसमें उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात की गई है. इस ट्वीट में उन्होंने लिखा, “दक्षिण एशिया में रेप-कल्चर के खिलाफ मेरे मजाकिया ट्वीट पर मेरे बॉस का लव लेटर. मैं नियमों में बदलाव की जरूरत पर बल देने के लिए इसे शेयर कर रहा हूं.”

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लेटर में लिखा है, ”आपके द्वारा दिए गए कई रिफरेंस पहली नजर में अखिल भारतीय सेवा नियमों के प्रावधानों का उल्लंघन हैं.”

35 साल के फैसल राज्य पर्यटन विभाग में अतिरिक्त सचिव हैं. वो फिलहाल मास्टर डिग्री के लिए अमेरिका में

सवाल: अनुशासनात्मक नोटिस को ट्वीट करने का क्या मतलब निकाला जाए. इससे आप क्या साबित करना चाहते हैं?
मेरा उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कमी को उजागर करना था. समाज का एक बड़ा हिस्सा सरकारी कर्मचारी है. लेकिन हम आमतौर पर उसके बारे में बात नहीं करते हैं. लोग ये समझते हैं कि सरकार और हमारे बीच कोई कॉन्ट्रैक्ट है और कर्मचारियों को सिर्फ उसका पालन करना है.

मैं इस ट्वीट के ज़रिए ये बहस करने का प्रयास कर रहा हूं कि कर्मचारी भी इस समाज का सदस्य है. वो बड़े नैतिक मुद्दों से अलग नहीं रह सकता है. सिर्फ सरकारी कर्मचारी होने का मतलब ये नहीं है कि वो सार्वजनिक चीजों से अलग रहे. मेरा मानना है कि, मैंने उचित सावधानी के साथ अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल किया है. उदाहरण के लिए मैंने कभी भी सरकारी नीति की आलोचना नहीं की है.

सवाल: आप जम्मू-कश्मीर के कई युवा ब्यूरोक्रैट्स में से एक हैं जो नियमित रूप से सोशल मीडिया पर अपनी बातें रखते हैं. अक्सर विवादास्पद मुद्दों पर लिखते हैं. एक अलग आईएएस ऑफिसर के तौर पर आपकी छवि सामने आ रही है.
हां, ऐसे कई अधिकारी हैं जो अपनी मन की बात रखने से नहीं चूकते हैं. इंटरनेट के आने से पहले भी ऐसे नियम थे जो लोगों को अपनी बात रखने से रोकता था. लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी आज काफी अहम चीज़ है. ऐसे समय में क्या सरकार अपने कर्मचारियों को चुप रहने, गुमनाम रहने, कोई राय नहीं रखने, बड़े मुद्दों पर सार्वजनिक बहस में भाग लेने रोक कर सकती है?

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सरकारी अधिकारी की एक छवि है. वो गुमनाम हैं, उन्हें बहस नहीं करनी है, उनके चारों ओर जो कुछ भी हो रहा है वो उसे देख कर अपनी आंखें बंद कर लें. लेकिन इसे अब बदलने की जरुरत है.

सवाल: क्या आपको लगता है कि इस चिट्ठी को पोस्ट करके और ऐसी हेडिंग लगा कर आपने नौकरी खोने का जोखिम उठाया है.
जिस तरह की बहस मैंने छेड़ी है वो बड़ी चीज़ है. मुझे अपनी नौकरी जाने का कोई डर नहीं है. मेरी नौकरी जा सकती है. लेकिन दुनिया संभावनाओं से भरी है.

सवाल: आप अपनी आठ साल की सेवाओं को किस तरह से देखते हैं?
मैंने शिक्षा और हाइड्रो पावर के क्षेत्र में कुछ काम किया है. ये एक अच्छा समय रहा है. मैं चाहूंगा कि मुझे लोगों का सेवा करने का मौका मिलता रहे.

सवाल: क्या ब्यूरोक्रेसी में आपको वो काम करने का मौका मिला है जो आप एक बाहरी व्यक्ति के तौर पर नहीं कर सकते थे?
मुझे पता है कि एक सिविल सेवा में रहते हुए लोगों की मदद करना कितनी बड़ी चुनौती है. सिविल सेवा में काम करना एक बड़ी चुनौती है. खास कर पॉलिटिकल बॉस के साथ काम करना एक बड़ी चुनौती है. अगर मैं अपना 100 प्रतिशत देने की कोशिश करता हूं, तो भी ये जरूरी नहीं है कि मेरे काम की तारीफ होगी. ये सब निर्भर करता है राजनीतिक माहौल पर. मुझे उम्मीद है कि घाटी के हालात में सुधार होगा.

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सवाल: जिस तरह से पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर आपको समोर्ट किया है क्या इससे आपकी टेंशन थोड़ी कम हुई है.
सिर्फ उमर अब्दुल्ला नहीं है, मैंने पहले भी कई दूसरे राजनीतिक हस्तियों के साथ अपनी बातें ट्विटर पर साझा की है. जब वे मेरे तर्क का तर्क देते हैं या समर्थन करते हैं तो वे इसे व्यक्तिगत रूप से अपनी व्यक्तिगत क्षमता में कर रहे हैं. इसे अनावश्यक राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए.

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