जब सुबे में भाजपा ने 16वीं लोकसभा के चुनाव में कई समीकरणों को ध्वस्त कर दिया था

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वर्ष 2014 में 16वीं लोकसभा के चुनाव ने कई समीकरणों को ध्वस्त कर दिया था. इनमें एक बड़ी बात जो हुई, वह थी बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की राजनीति की चमक फीकी पड़ जाना. दरअसल उस साल नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पूरे देश में ऐसी लहर चली कि सारे अनुमान धरे के धरे रह गए. कई कद्दावर नेताओं को जनता ने ऐसा झटका दिया जो बाद के दौर में नए राजनीतिक समीकरणों का आधार बनीं. बिहार के संदर्भ में यह खास इसलिए था कि मोदी लहर के असर से राजनीति में एक दूसरे के धुर विरोधी माने जाने वाले लालू-नीतीश भी एक हो गए थे.

दरअसल बिहार की 40 लोकसभा सीटों में एनडीए ने 31 सीटों पर कब्जा कर लिया था और यही नतीजा नीतीश और लालू के एक होने की बड़ी वजह बनी थी. अलग-अलग लड़ी लालू की पार्टी आरजेडी को सिर्फ़ 4 सीटें मिली थी वहीं नीतीश की पार्टी जेडीयू को 2 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था. कांग्रेस को भी 2 सीट मिली थी और एनसीपी को एक. साफ था कि मोदी लहर ने सबको पस्त कर दिया था.

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बिहार की 40 सीटों में एनडीए ने 31 सीटों पर जीत दर्ज की थी इनमें बीजेपी को 22 सीटें मिली थीं. पासवान की एलजेपी को 6 और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी को 3 सीटें मिली थीं.

वहीं विधानसभावार स्थिति पर नजर डालें तो 243 क्षेत्रों में 122 क्षेत्रों में बीजेपी आगे थी, 34 क्षेत्रों में एलजेपी आगे थी और 17 क्षेत्रों में कुशवाहा की पार्टी आगे थी. यानि 243 में 173 क्षेत्रों में एनडीए आगे था.

2014 के लोकसभा चुनाव में पड़े वोटों को विधानसभा क्षेत्रों में बांटें तो लालू की पार्टी 32 क्षेत्रों में आगे थी, नीतीश की पार्टी 18 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थी और नीतीश के साथ चुनाव लड़ने वाली सीपीआई 1 क्षेत्र में आगे थी. कांग्रेस 14 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थी और एनसीपी 5 में आगे थी.

हालांकि इस बार स्थिति उलट है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक साथ आ गए हैं और रामविलास पासवान अब भी एनडीए का हिस्सा हैं. आरएलएसपी जरूर अलग हो गई है, लेकिन नीतीश कुमार के आने के साथ एनडीए खेमा पहले से और मजबूत दिख रहा है.

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दूसरी ओर आरजेडी, कांग्रेस, आरएलएसपी, हम, लेफ्ट और मुकेश सहनी की वीआईपी के एक साथ आने से इस बार जातिगत समीकरण कुछ अलग नजर आ रहे हैं. आरजेडी अपने ‘MY’ यानि मुस्लिम यादव के फॉर्मूले पर आगे बढ़ रही है तो कांग्रेस मुस्लिमों के साथ सवर्णों को साधने में लगी है.

वहीं मांझी, कुशवाहा, सहनी और लेफ्ट पार्टियों के गठजोड़ से पिछड़े और दलित समुदाय को गोलबंद करने में लगी है. जाहिर है यह गोलबंदी अगर जमीन पर मजबूत होगी तो एनडीए के लिए परेशानी का सबब हो सकती है. लेकिन सवाल ये है कि यह वोटिंग के दौरान किस पैटर्न पर चलती है यह देखना दिलचस्प होगा.

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