आज ही के दिन नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का इस धरा-धाम पर अवतरण

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देश की आजादी के लिए किए गए संघर्षो में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की महती भूमिका रही है। आज ही के दिन नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का इस धरा-धाम पर अवतरण हुआ था और लोग उनकी जयन्ती शिद्दत से मनाते है। हालांकि नेता जी का नेतृत्व और कृतित्व सरकार की उदासीनता व उपेक्षा के कारण इतिहास का वस्तु बनकर रह गया है जिसे नई पीढ़ी को अवगत होने की जरूरत महसुस की जा रही है। राष्ट्रवाद के प्रबल पुरोधा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आजादी के संघशरे के दौरान चम्पारण की यात्रा की थी और यहां कई जन सभाए कर लोगों से मोकम्मिल आजादी के लिए संघर्ष करते रहने का आह्वान किया था। गौर तलब है कि कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तिफा देने के बाद नेता जी ने अग्रगामी दल का निर्माण किया था और वो भारत भ्रमण पर निकल पड़े थे। उसी दौरान रामगढ़ (झारखण्ड) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 1940 में अधिवेशन बुलाया गया था जिसमें गांधी जी द्वारा लॉर्ड से समझौता कर आजादी प्राप्त करने और भारत को बांटकर अलग पाकिस्तान देश बनाने का प्रस्ताव लाया जाना था। नेता जी सुभाश चन्द्र बोस कांग्रेस के इस प्रस्ताव के घोर विरोधी थी और इसी हेतु कि ‘‘‘‘देश का विभाजन नही हो और बांट कर आजादी नही ली जाए’’ अर्थात् ‘‘‘‘मुकम्मल आजादी’’ संघर्षो के बल पर प्राप्त किया जाए कि मंशा से वे देश भ्रमण पर निकले थे। इसी दौरान नेताजी सुभाष चन्द्र बोस छह फरवरी 1940 को मेहसी के रास्ते चम्पारण आए थे। चम्पारण यात्रा के दौरान उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी युवा व क्रांतिकारी नेता पंडित श्याम सुन्दर ठाकुर को सौंपी गयी थी जिनके साथ पचीस युवकों का दल बनाया गया था। मेहसी में नेता जी को रिसिव कर जैसे ही यह दल आगे की ओर बढ़ा मेहसी के क्रांतिकारियों व आन्दोलनकारियों ने नेता जी के वाहन को रोक उनसे दो शब्द भाषण देने और नागरिक पुस्तकालय का निरीक्षण करने का अनुरोध कर डाला। नेता जी इस जन प्यार को नकार नही सके और सड़क से दूर स्थित युवा क्रांतिकारियों द्वारा स्थापित नागरिक पुस्तकालय का निरीक्षण किया और वहां मौजूद सैकड़ों लोगों को संबोधित किया। वहां के बाद सुभाश चन्द्र बोस मोतिहारी के रास्ते बेतिया पहुंचे जहां बड़ा रमणा मैदान में उन्होंने जन सभा को संबोधित किया। बेतिया के सरेया मन के निकट स्थित नेताजी के सहकर्मी व अग्रगामी दल के तबके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष महंथ धनराजपुरी के आवास पर रात्रि विश्राम किया। दूसरे दिन सात फरवरी को नेताजी सुभाश चन्द्र बोस मोतिहारी आए और बंजरिया पण्डाल स्थित देवी दयाल साह द्वारा दान में दी गयी कांग्रेस आश्रम की भूमि के मैदान में आहूत जन सभा को संबोधित किया। यहां संबोधन में उन्होंने लोगों से मुकम्मिल आजादी की अपील की और गांधी के आजादी पाने के तरीके को देश के साथ धोखा बताया था। नेता जी ने कहा था कि अखिल भारतीय कांग्रेस मिस्टर जिन्ना के बहकावे में आ चुकी है और वृतानी हुकूमत देश में साम्प्रदायिकता फैलाकर धर्म के आधार पर मुल्क को बांटने की साजिशे रच रहा है। आजादी के सात वर्श पूर्व चम्पारण की धरती पर नेताजी का यह उदगार उनके समर्थक कभी नही भूल पाए। यहां नेता जी मिस्कॉट मुहल्ला स्थित देवी दयाल साह के मकान में ठहरे और रात्रि विश्राम किया। यहां के बाद आठ फरवरी की सुबह उन्हे गोपाल गंज जाना था और कड़ी सुरक्षा में नेता जी को तबके गोविन्दगंज थाना क्षेत्र के बरियरिया गांव स्थित गण्डक नदी के घाट से नाव के सहारे नदी पार कराया गया। वहां बरियरिया गांव के ही निवासी और युवा क्रांतिकारी राजेन्द्र पाण्डेय के नेतृत्व में एक टीम सुरक्षा व नाव व्यवस्था के लिए तैनात थी जिन्होंने नेता जी को गोपालगंज पहुंचाने में मदद की। नेता जी के साथ बिहार के तबके बड़े क्रांतिकारी नेता शीलभद्रयाजी, केएन साण्डिल्य, महंथ धनराजपुरी, सियाराम ठाकुर, पंडित श्याम सुन्दर ठाकुर, केदार मणि शुक्ल, पति राम सोनार आदि नेता मौजूद थे। नेताजी की भविष्यवाणी 47 में सही साबित हुई और कांग्रेस की पूर्व निर्धारित योजना के तहत आखिर कार देश को साम्प्रदायिकता के आधार पर बांट दिया गया। धर्म निरपेक्षता की वकालत करने वाली कांग्रेस ने भारत को बांट कर इस्लाम धर्म के नाम पर पाकिस्तान का निर्माण करा दिया। यही कारण था कि नेता जी के लापता हो जाने के बावजूद देश भर में फैले उनके समर्थक व अग्रगामी दल के कार्यकर्ताओं ने पन्द्रह अगस्त 1947 को सड़कों पर जुलूस निकाल कर ‘‘‘‘यह आजादी धोखा है, बटवारे की आजादी धोखा है’’ जैसे नारे लगाते रहे और काली पट्टी बांधकर बंटवारे की इस आजादी का विरोध किया था।

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