चुनावी रणवीरों’ ने बढ़ायी घटक दलों की परेशानी

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जैसे-जैसे लोकसभा का चुनावी संग्राम नजदीक आते जा रहा है गठबंधन की राजनीति में एक दूसरे को शिकस्त देने के रास्ते में नयी-नयी मुश्किलें आ रही हैं। सच्चाई यह है कि मौका देख दलों को चुनने वाले ‘‘ चुनावी रणवीरों’ ने लगभग दलों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। चुनावी रणनीति के साथ दलों को थामने वाले इन रणवीरों को चुनावी समर में उतारने को लेकर दलों के नेतृत्वकर्ता परेशान हैं। नतीजतन हर दल अपने लिए ज्यादा-से-ज्यादा सीटों को पाने के लिए दावेदारी की सूची तैयार कर वार्ता को ‘‘ सम्मानजनक समझौता ’ की झोली में डालने को बेताव है। राज्य में राजद के नेतृत्व में बने महागठबंधन की सच्चाई यह है कि कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी,ंिहन्दुस्तानी अवाम मोर्चा अपने लिए अधिक से अधिक सीटें हासिल करने को तरह-तरह का स्वांग भी रचने लगे हैं। लोकसभा में चुनावी भागीदारी के जब कभी सवाल उठे तो उनकी हद को 10 लोकसभा सीटों तक आंका गया। मगर कांग्रेस की कोशिश 10 से 15 लोकसभा सीट पाने की हो रही है। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस नेतृत्व की परेशानी कु छ तो परोक्ष व कुछ अपरोक्ष कारणों से होने लगी है। राजनीतिक गलियारों की मानें तो राजद से अधिक सीटें पाने के जो हथकंडे अपनाएं जा रहे हैं उसके पीछे कांग्रेस से जुड़े या कांग्रेस के प्रति लगाव दिखा रहे कु छ खास नामों को लेकर हो रही है। ऐसे में कहा जा रहा है कि कांग्रेस का एक धड़ा पप्पू यादव, अनंत सिंह, कीर्ति आजाद और शत्रुघ्न सिन्हा को शामिल करा कर कुछ और लोकसभा सीटों को अपने नाम करना चाहता है। महागठबंधन में शामिल हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा(से) ने भी अब अपनी बांहे फैलानी शुरू कर दी हैं। दरअसल हम (से) के द्वारा ज्यादा सीटों की दावेदारी के पीछे भी की कहानी भी वही है। सूत्रों के अनुसार हम(से) को लेकर यह माना जा रहा था कि मांझी के वोट वैंक को ध्यान में रखकर एक लोकसभा और एक विधान परिषद की सीट के अलावा कई विधानसभा सीटों पर दांव लगाया गया है। लेकिन हम(से) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मांझी ने जब किसी भी घटक दल से एक सीट ज्यादा की मांग रख दी तो उसके पीछे भी हम (से) के रणवीरों को चुनाव लड़ाने की मजबूरी शामिल थी। इनके खेमे में चुनावी रणवीरों की भी कमी नहीं है। इनके साथ पूर्व मंत्री डॉ. महाचंद्र प्रसाद सिंह, अनिल कुमार व अजीत सिंह भी शामिल हैं। सूत्र बताते हैं कि पहले तो हम (से) दो सीटें एक राष्ट्रीय अध्यक्ष व दूसरा प्रदेश अध्यक्ष रहे वृषिण पटेल के लिए मांग रहा था। मगर श्री पटेल के जाने के बाद उनकी प्राथमिकता डॉ. महाचंद्र सिंह बन गये हैं। राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के यहां भी ‘‘ चुनावी रणवीरों’ की कमी नहीं है। राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा के साथ-साथ सांसद रामकुमार शर्मा तो हैं ही इसके अलावा दसई चौधरी, भूदेव चौधरी जैसे कई और रणवीर हैं जिन्हें पार्टी चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाना चाहती है। श्री कुशवाहा जहानाबाद सीट से जीते अरुण कुमार का भी स्थानापन्न के रूप में कोई सीट चाहते हैं। लोकतांत्रिक जनता दल भी कई सीटों की दावेदारी पेश कर चुका है। इनकी जरूरत यह है कि दल शरद यादव के साथ-साथ उदय नारायण चौधरी व रमई राम को भी चुनावी मैदान में उतारना चाहता है। जनता दल यू में चुनावी रणवीरों की भरमार होती जा रही है। गौरतलब यहां यह है कि यह सब परिवर्तन तब हो रहा है जब सीटों की संख्या का निर्धारण एनडीए के भीतर वगैर किसी हील हुज्जत के हो चुका है। हाल ही में शामिल नरेन्द्र सिंह व रामजतन सिन्हा को लेकर भी क्षेत्र का निर्धारण होने लगा है। भगवान सिंह कुशवाहा व अवधेश कु शवाहा के जनता दल में शामिल होने को भी चुनाव रणबांकुरे के रूप में देखा जा रहा है। नागमणि का जदयू के प्रति प्यार उमड़ने के पीछे की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वैसे भी नागमणि व उनकी पत्नी सुचित्रा सिंह राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। इसके अलावा भी कई रणबांकुरे हैं जो अपनी राह बनाने में लगे हैं और दलों कींिहस्सेदारी बढ़ाने के लिए दबाव बना रहे हैं। कहना नहीं होगा इन्हीं जरूरतों के बीच वैशाली सांसद रामा सिंह हों या मुन्ना शुक्ला जैसे रणबांकुरे अपनी-अपनी राह तलाशने में जुटे हैं।

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