गांधी की शिक्षा हमारी संस्कृति के अनुरूप

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जेडी वीमेंस कॉलेज, पटना में चल रहे दर्शन परिषद्, बिहार के 41वें वार्षिक अधिवेशन के दूसरे दिन बुधवार को कई शैक्षणिक कार्यक्रम संपन्न हुए। इसके तहत मुख्य रूप से व्याख्यान, संगोष्ठी एवं पत्र-वाचन हुआ। इसमें देश के कई विद्वानों ने दर्शन के विभिन्न विषयों पर अपने-अपने विचार व्यक्त किये। अधिवेशन में कुल नौ व्याख्यान प्रस्तुत किये गये। इनमें डॉ. रामजी सिंह ने ‘‘शिक्षा, समग्र स्वास्य एवं स्वच्छता : गांधी दर्शन के संदर्भ में’ विषय पर विशिष्ट व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि गांधी की शिक्षा पद्धति भारतीय संस्कृति के अनुरूप है। इसमें आंतरिक एवं बाह्य दोनों तरह की स्वच्छता की बात निहित है। इसके माध्यम से हम समग्र स्वास्य को प्राप्त कर सकते हैं। डॉ. आईएन सिन्हा ने डॉ. रामनारायण शर्मा बुजुर्ग विमर्श व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि बुजुर्ग ज्ञान के भंडार होते हैं। एक बुजुर्ग के निधन से एक पुस्तकालय का अंत हो जाता है। यही कारण है कि प्राचीन भारत में बुजुगरे को काफी सम्मान प्राप्त था। लेकिन वर्तमान काल में बुजुगरे की स्थिति खराब हुई है। बुजुगरे के प्रति समाज की वर्तमान धारणा को बदलने की जरूरत है। साथ ही बुजुगरे को भी चाहिए कि वे निहित स्वार्थो से ऊपर उठकर लोक कल्याणार्थ अपना जीवन समर्पित करें। डॉ. प्रभु नारायण मंडल (भागलपुर) ने सिया देवी माधवपुर (खगड़िया) स्मृति व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि मूल्यों के संदर्भ में सापेक्षवाद, एकत्ववाद एवं बहुलवाद ये तीन सिद्धांत प्रचलित हैं। इनमें बहुलवाद एक उदारवादी मत है। इसके अनुसार सभी मूल्यों के बीच समन्वय की जरूरत है। वर्तमान संदर्भ में यह आवश्यक है कि हम किसी एक मूल्य या मूल्यों के समूह को सबों पर नहीं थोपें। मूल्यों की बहुलता को स्वीकार करें। सभी मूल्यों के बीच समन्वय एवं सामंजस्य स्थापित करें। डॉ. जटाशंकर (प्रयागराज) ने कहा कि समग्र स्वास्य और समग्र शिक्षा भारतीय चिंतन के मूल में विद्यमान है। भारतीय चिंतन में निरंतरता है। यहां मुक्ति का अर्थ लोक से मुक्ति नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए मुक्ति है। डॉ. आलोक टंडन (हरदोई) ने श्रीप्रकाश दुबे स्मृति व्याख्यान के अंतर्गत ‘‘संस्कृति और मानववाद’ पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृति निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसका संबंध मनुष्य के गुणात्मक विकास से है। डॉ. नीलिमा सिन्हा (बोधगया) ने प्रोफेसर सोहन राज लक्ष्मी देवी तातेड़, जोधपुर व्याख्यान के तहत भूमंडलीकरण, मुंडेलीकरण एवं नवराष्ट्रवाद पर अपने विचार प्रस्तुत किया। डॉ. सभाजीत मिश्र (गोरखपुर) ने राधारमण प्रसाद सिन्हा स्मृति व्याख्यान दिया। उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति एवं दर्शन की उपयोगिता पर संवृतिशास्त्रीय दृष्टि को केन्द्र में रखकर विस्तार से प्रकाश डाला। डॉ. महेश सिंह (आरा) ने बेनी विश्व बाबूधान स्मृति व्याख्यान में योग के महत्व की र्चचा की।अधिवेशन में ‘‘मंडन मिश्र एवं वाचस्पति मिश्र का भाषा दर्शन’ पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई। इसकी अध्यक्षता आईसीपीआर, नई दिल्ली के सदस्य-सचिव डॉ. रजनीश कुमार शुक्ल ने की। इसमें डॉ. अम्बिका दत्त शर्मा (सागर) ने टिप्पणीकार की भूमिका निभाई। इसमें विभिन्न वक्ताओं ने इन दोनों दार्शनिकों के अवदानों को रेखांकित किया। दूसरी संगोष्ठी ‘‘दार्शनिक क्रिया और व्यावसायिक निपुणता’ विषय पर बुधवार को आयोजित होगी। अधिवेशन में पांच विभागों धर्म दर्शन, नीति दर्शन, समाज दर्शन, तत्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा में लगभग सौ शोध आलेख प्रस्तुत किये गये। प्रत्येक विभाग में 35 वर्ष से कम उम्र के युवा लोगों द्वारा प्रस्तुत श्रेष्ठ आलेखों पर जेएन ओझा स्मृति युवा पुरस्कार (1000 रुपये) और डॉ. विजयश्री स्मृति युवा पुरस्कार (1000 रुपये) प्रदान किये जायेंगे। इसके साथ ही सभी विभागों में श्रेष्ठ पाये गये आलेख को प्रोफेसर सोहन राज लक्ष्मी देवी तातेड़, जोधपुर (राजस्थान) पुरस्कार (2000 रुपये) भी दिया जाएगा। ये सभी पुरस्कार गुरुवार को समापन सत्र में प्रदान किये जाएंगे। इसके अलावा नव नियुक्त असिस्टेंट प्रोफेसरों को भी सम्मानित किया जाएगा।

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