ऊंच-नीच, छुआछूत और भेदभाव का दिखाया हश्र

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नाटक चंडालिका सदियों से चली आ रही छुआछूत, ऊंचनीच, भेदभाव, जातिप्रथा पर करारा प्रहार करता है। आज भी समाज में कायम छुआछूत और भेदभाव की समस्या को नृत्य नाटिका के जरिए जोरदार ढंग से दिखाया गया। नाटक के निर्देशक प्रो. के जीतेन सिंह ने 20 से 25 मिनट की नृत्य नाटिका में पूरी कहानी को बखूबी कहा है। रविवार को रवींद्र परिषद की ओर से रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर रवींद्र भवन में नाटक ‘चंडालिका’ का मंचन किया।

नाटक देखने के लिए बतौर मुख्य अतिथि बिहार सरकार में कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार उपस्थित थे। नाटक में चंडालिका समाज की पिछड़ी सोच पर जोरदार प्रहार करता है। नाटक में समाज भेदभाव की समस्या पर अपनी बात कलात्मक ढंग में कहने की कोशिश करता है। नाटक में चंडालिका की बेटी प्रकृति द्वारा बोला गया संवाद ‘जो मुङो मानता है मैं उसे मानती हूं’। जो समाज हमें मानता मैं उसे मानती हूं। जो धर्म मेरा सम्मान करता है मैं उसका सम्मान करती हूं। वो धर्म किस काम का जो बांटता है अपमानित करता है। यह संवाद छुआछूत के खिलाफ क्रांति का अपील है।

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