उपचुनाव में छह दिन शेष : महागठबंधन की अजीब दास्तां

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बिहार में विधानसभा की पांच सीटों पर उपचुनाव में अब कुछ दिन ही बचे हैं. 21 अक्टूबर को वोटिंग होनी है. यह चुनाव भले ही छोटा हो, लेकिन एनडीए और महागठबंधन के लिए यह किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है. अग्नि परीक्षा इस मायने में कि एनडीए में बीजेपी-जेडीयू की दोस्ती में खटास आ चुकी है. लेकिन इस चुनाव को जीतकर यह संदेश देना जरूरी है कि सबकुछ ऑल वेल है और लोकसभा की प्रचंड जीत का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा.

महागठबंधन की स्थिति कुछ अजीब सी है. लोकसभा चुनाव के बाद सभी दल और उसके बड़े नेता किसी सार्वजनिक मंच पर एक साथ नहीं आए हैं और जब 12 अक्टूबर को लोहिया जयंती पर मिले भी तो ईगो, भेदभाव, विषपान जैसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ. तेजस्वी और मांझी एक दूसरे से आंखे मिलाने से बचते रहे. अगर इन परिस्थितियों में महागठबंधन हारा तो यह मानने में देर नहीं लगेगी कि बिहार में महागठबंधन खत्म हो गया.

सबसे पहले बात महागठबंधन की…
उपचुनाव में सीटों के बंटवारे में महागठबंधन की सभी पार्टियों ने बिना एक दूसरे से बात करके सीटों पर ताल ठोंक ली. आरजेडी ने किशनगंज को छोड़कर बाकी की सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिये. जीतनराम मांझी की पार्टी ‘हम’ ने भी भागलपुर की नाथनगर सीट पर अपने उम्मीदवार उतार दिये. नई पार्टी वीआईपी ने भी सिमरी बख्तियारपुर सीट पर अपनी दावेदारी ठोंक दी. हालांकि इन सबमें एक बार फिर उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी RLSP ने मौन धारण कर रखा है. इसी बीच लोहिया की जयंती पर महागठबंधन की सभी पार्टियों का एक मंच पर जुटान हुआ.

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तेजस्वी, मांझी, शरद यादव, मदनमोहन झा, उपेन्द्र कुशवाहा सहित सभी नेता जुटे भी. उस समय ऐसा लगा कि जितना बिखराव होना था, हो चुका. अब सारी चीजें ठीक हो जाएंगी, लेकिन बैठक में ही यह भ्रम तब टूट गया, जब मांझी और तेजस्वी ने एक दूसरे से ऐसी दूरी बनाई कि एक दूसरे की तरफ देखने तक से परहेज किया. जब तेजस्वी ने भाषण दिया कि उन्होंने ईगो पर फोकस किया और कहा कि सभी लोग अपना-अपना ईगो छोड़ें.

विषपान जैसे शब्दों का इस्तेमाल
जाहिर था कि ईगो वाला बयान जीतनराम मांझी के लिए था. क्योंकि तेजस्वी के नेतृत्व के सहारे वे बिल्कुल भी आगे चलने को तैयार नहीं थे. फिर जब उपेन्द्र कुशवाहा ने भाषण दिया तो विषपान जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर कहा कि सभी लोग अमृत पी लें, विषपान वे कर लेंगे. उपेन्द्र कुशवाहा के बयान से जाहिर था कि महागठबंधन के रिश्तों में विष भर गया है. जिसे पीने के लिए कोई तैयार नहीं है.

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तेजस्वी पर भेदभाव का आरोप
इस बैठक के ठीक एक दिन बाद जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी अपने उम्मीदवार को पक्ष में प्रचार करने भागलपुर गए तो खुलेआम दोनों नेताओं ने तेजस्वी पर भेदभाव का आरोप मढ़ दिया. अब जब रिश्तों में ईगो, विषपान और भेदभाव जैसे शब्द आ गए हों तो वहां सामंजस्य की बात भी बेमानी है. अब हालात यह है कि नाथ नगर की सीट पर ‘आरजेडी’ और ‘हम’ दोनों के उम्मीदवार मैदान में होंगे.

इस बैठक के ठीक एक दिन बाद जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी अपने उम्मीदवार को पक्ष में प्रचार करने भागलपुर गए तो खुलेआम दोनों नेताओं ने तेजस्वी पर भेदभाव का आरोप मढ़ दिया.

तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव कड़ी अग्नि परीक्षा
बाकी सीटों पर भले ही कोई दूसरा उम्मीदवार न हो, इतना तो जरूर है कि कोई भी एक दूसरे की इस चुनाव में मदद करने से तो रहा. तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव कड़ी अग्नि परीक्षा है. एक तो उनकी छवि हारे हुए सेनापति के रूप में बन चुकी है. वहीं दूसरी ओर पहली बार अपने दम पर पार्टी चुनाव लड़ रही है. ऐसे में यह चुनाव खुद तेजस्वी और उनकी पार्टी आरजेडी का भविष्य तय करेगा.

अब बात एनडीए की….
इस गठबंधन की सबसे बड़ी खासियत कहें या सबसे बड़ा दुर्भाग्य कि दोनों लंबे समय से साथ में हैं, लेकिन भरोसा किसी को किसी पर नहीं रह गया है. कब कौन नेता खड़ा होकर किसके खिलाफ बयान दे दे, कहना मुश्किल है. पहले नेतृत्व का सवाल और फिर जलजमाव के मुद्दे पर लंबी बयानबाजी ने एनडीए को सामान्य परिस्थितियों ने निकाल कर असहजता की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है. 21 अक्टूबर के उपचुनाव में दोनों पार्टियां शांति से चुनाव प्रचार कर रही हैं.

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समस्तीपुर लोकसभा सीट पर चुनाव प्रचार
खुद नीतीश कुमार 17 अक्टूबर को एलजेपी के खाते वाली समस्तीपुर लोकसभा सीट पर चुनाव प्रचार करने जाएंगे तो उसी दिन बीजेपी के खाते वाली किशनगंज विधानसभा सीट पर भी वे चुनाव प्रचार करेंगे. सभी जगहों पर उनके साथ डिप्टी सीएम सुशील मोदी भी रहेंगे.

शांत हुआ जिन्न फिर बाहर निकलेगा
अगर सारी सीटों पर एनडीए जीता तो ठीक है, लेकिन अगर गलती से एक दो सीट एनडीए हार गयी तो जेपी नड्डा की गिरिराज सिंह को दी गई नसीहत से शांत हुआ जिन्न फिर बाहर निकलेगा और फिर बवंडर मचाएगा. कुल मिलाकर, ये कहने को उपचुनाव है, लेकिन यह उपचुनाव और इसके परिणाम… आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति को वह रास्ता दिखाएगा, जिसपर चलकर 2020 का विधानसभा चुनाव का सफर तय होगा.

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