उपचुनाव परिणाम कहीं लोकसभा चुनाव का ट्रेलर तो नहीं!

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अब इसे वर्ष 2014 में देश भर में चले ‘‘ मोदी मैजिक’ के जलवे का उतरना कहें या सशक्त होते विपक्ष की एकजुटता का परिणाम। मगर सच तो यह है कि कर्नाटक उपचुनाव के परिणाम ने एक बार फिर एनडीए को मजबूत होते विपक्ष के बरक्स सोचने को मजबूर कर दिया है। वैसे भी वर्ष 2014 लोकसभा के बाद देश भर में जितने भी उपचुनाव हुए एनडीए बहुत सुकून की राजनीति के साथ नहीं रही। आंकड़ों की कहानी भी भाजपा नीत एनडीए के साथ खड़ी होते नहीं दिखती है। वर्ष 2014 के बाद देश भर में कुल 27 लोकसभा सीटों पर चुनाव हुए इनमें भाजपा को महज पांच सीटों पर जीत हासिल हो सकी। शेष सीटों पर कांग्रेस व अन्य दलों का जलवा कायम रहा। पार्टीगत स्थिति का आकलन करें तो इन उपचुनावों में कांग्रेस सात सीट हासिल करके सबसे आगे रही। वर्ष 2014 वे 2018 तक भाजपा नीत सरकार को अब तक हुए उपचुनावों में 10 सीटों का नुकसान उठाना भी पड़ा। बिहार के संदर्भ में बात करें तो अररिया लोकसभा उपचुनाव में भी एनडीए के उम्मीदवार को हार मिली। यहां तक कि तीन विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव में भी एनडीए ने महज एक सीट पर जीत हासिल की। भभुआ विधानसभा सीट पर भाजपा फिर से काबिज हुई वहीं जोकीहाट व जहानाबाद में एनडीए के घटक दल जदयू को हार का सामना करना पड़ा। यहां तक कि भाजपा को उत्तर प्रदेश में भी गोरखपुर व फूलपुर सीट सपा के हाथों हार मिली। वर्तमान राजनीति की बात करें तो एस.सी/एस.टी. एक्ट को लेकर कोर्ट के विरुद्ध जाना भी एनडीए के लिए सवर्ण वोटों की नाराजगी का कारण बनेगा। कई जगहों पर एनडीए नेताओं को विरोध का सामना करना पड़ा। इस मसले पर विपक्ष की एकता को दलितों का विास भी हासिल होने लगा है। यह दीगर कि दलितों के हितैषी को लेकर जदयू का लगातार चल रहा अभियान या फिर लोजपा के रामविलास पासवान की नयी भूमिका के लिए तैयार करने की रणनीति से एनडीए की चिंता का पता भी चलता है। शायद यह वजह भी है कि जब राजनीतिक सारे अस्त्र जब फेल होने लगते हैं तो ब्रह्मास्त्र के रूप में राम मंदिर के मुद्दे को आवाज दी जाती है। हालांकि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रेमरंजन पटेल कहते हैं कर्नाटक चुनाव की इस जीत का आगामी लोकसभा चुनाव से कोई लेना देना नहीं। यह उपचुनाव कोई नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने को लेकर नहीं था। कर्नाटक की जनता ने राज्य में बनी नयी सरकार के समर्थन में वोट दिया है। जहां तक भाजपा का सवाल है तो यह लोकसभा की एक सीट जीती है तो एक हारी है। मगर भाजपा के वोट प्रतिशत में कोई अंतर नहीं आया है। इस उपचुनाव में कांग्रेस जे.डी.एस के मिलन का भी थोड़ा प्रभाव पड़ा है। राजद के वरीय नेता व राष्ट्रीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी भी कर्नाटक उपचुनाव के परिणाम को लोकसभा का आगाज मानते क हते हैं कि यह एन्टी मोदी ट्रेन्ड का इजहार है। जिन्हें संविधान पर भरोसा नहीं जिन्हें लोकतंत्र में आस्था नहीं,जो उच्चतम न्यायालय को हड़काते रहते हैं उस भाजपा के विरुद्ध एक तरह से जनादेश है। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता राजेश राठौड़ भी इस उपचुनाव परिणाम को नरेन्द्र मोदी की घटती लोकप्रियता तथा राहुल गांधी की घटती लोकप्रियता से जोड़ कर देखते हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जो भी उपचुनाव अब तक हुए हैं उनमें 20 प्रतिशत ही भाजपा जीती है जबकि कांग्रेस व अन्य को 80 प्रतिशत सीटों पर सफलता मिली है। यह तो वर्ष 2019 लोकसभा की झांकी है पूरा देश बाकी है।

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