आसिफा की याद में नाटय़ोत्सव शुरू

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राजधानी के कालिदास रंगालय में ‘‘कोरस नाट्य समूह द्वारा आयोजित’ आजाद वतन-आजाद जुबां नाट्योत्सव की शुरुआत हुई। इस अवसर पर बृजराज सिंह सम्पादित कविताओं की पुस्तक आसिफाओं के नाम का विमोचन जसम महासचिव मनोज सिंह, प्रो. डेजी नारायण और परवेज अख्तर के हाथों हुआ। उद्घाटन सत्र में पटना के प्रसिद्ध रंगकर्मी परवेज अख्तर ने कहा कि मैं कोरस के अभियान से खुद को जोड़ना चाहता हूं। स्त्री आजादी के सवाल पर कोरस की सक्रियता पूरे हिंदी पट्टी में एक अनोखी और जरूरी पहल है। उन्होंने कहा कि आज हमारी अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। यह अंग्रेजों के समय से ही चला आ रहा है। उनका ही बनाया ड्रेमेटिक पर्फामेंस ऐक्ट आज भी चल रहा है। हम अघोषित प्रतिबंध के दौर में रह रहे हैं। ऐसे दौर में इस नाट्योत्सव में महिला निर्देशकों का काम हमें प्रेरित करेगा। हमें कय के सवाल को ही नहीं, शिल्प के सवाल को भी गंभीरता से लेना होगा। स्वागत समिति की अध्यक्ष पटना विविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर डेजी नारायण ने कोरस की तरफ से सबका स्वागत करते और धन्यवाद देते हुए कहा कि कोरस के साथियों ने इस आयोजन के लिए बहुत मेहनत की। पटना व बिहार की मजबूत नाट्य संस्कृति को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि इसी कड़ी में कोरस ने महिला विषयों पर नाटक-गीत-कविता सहित कई विधाओं में काम किया। महिलाओं का सवाल सिर्फ महिलाओं का नहीं, वरन पुरु षों व पूरे समाज का है। इस सत्र का संचालन वीमेंस कॉलेज की अध्यापिका ऋचा ने किया। नाट्योत्सव का पहला नाटक था कुच्ची का कानून। निर्देशक समता राय के कुशल संयोजन में रंगमंच पर उतारी गयी वरिष्ठ कहानीकार शिवमूर्ति की यह कहानी स्त्री के संघर्ष की दास्तां है। एक ऐसी ग्रामीण स्त्री इस नाटक के केंद्र में है जो अपने पूरे समाज से लड़ पड़ती है पर आत्मसमर्पण नहीं करती। महिला की कोख तक से उसका अधिकार छीन लेने वाला पितृसत्तात्मक समाज सिर्फ महिलाओं का उपयोग करता है। उसके व्यक्तित्व को हर तरह से दबाने की कोशिश करता है। पर इसी समाज में महिला प्रतिरोध का कभी न सूखने वाला सोता भी बहता है। नाटक संस्कृति के भीतर महिला के इसी प्रतिरोधी स्वर को उभारता-विकसित करता है।

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