आप और विवाद

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दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार और उसके विधायक फिर विवादों के घेरे में हैं। उन पर अपनी सरकार के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को धमकी देने और उनके साथ मारपीट के आरोप हैं। हालांकि इसे भी अन्य मामलों की भांति दिल्ली और केंद्र सरकारों के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। बहुधा लोग इसी नजरिये से आप और भाजपा के बीच तनाव को देखते रहे हैं। इनका मानना है कि ये सब और कुछ नहीं, दिल्ली की सत्ता में भाजपा के आने की बेसब्री है। इसका प्रतिफलन तरह-तरह के टकरावों में होता रहता है। हो सकता है, कुछ मामलों में ऐसा हो भी। यह अस्वाभाविक भी नहीं है। विपक्षी पार्टी होने का एक अर्थ अपने लिए सत्ता में आने का अवसर जुटाना भी है। लेकिन इसका हरेक मामले में तोहमत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। मौजूदा प्रकरण में बहुत झोल हैं। यह मीटिंग बुलाने के तरीके और उसकी टाइमिंग से ही जाहिर होता है। मुख्य सचिव को मीटिंग में आने के तकादों और आधी रात के समय से स्पष्ट हो जाता है कि आप के विधायक और सरकार कोई खास संकेत देने की तैयारी किये बैठे थे। यह तय अपनी जगह है कि परिस्थितियों की गंभीरता के मुताबिक कैबिनेट मीटिंग कभी भी बुलाई जा सकती है। पर आप की बैठक उस स्तरीय की भी नहीं थी और न राशन कार्ड की गड़बड़ियों का हल करने की वैसी आपात स्थिति थी। यह काम दिन में हो सकता था। लेकिन मुख्य सचिव की प्राथमिकी कहती है कि मसला राशन कार्ड का नहीं, तीन साल की उपलब्धियों का ढोल पीटने के लिए पैसे जारी न करने का था। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट की नियमावली का उनके हवाला देने पर आप विधायक संतुलन खो बैठे और मुख्य सचिव के साथ ‘‘मुक्केबाजी’ की गई। वैसे यह बात ‘‘प्रयोगधर्मी’ सरकार की अतिशय विज्ञापनप्रियता मेंझलकती रही है, जो प्रतिबंधों के बीच भी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आवाजों के उपयोग का उपाय निकालती रही है। दूसरे आप पर इस प्रकरण में अविास के लिए खुद उसका रिकार्ड जवाबदेह है। मनचाहे काम करवाने के लिए वह अपने संख्याबल के असंवैधानिक इस्तेमाल पर ज्यादा भरोसा करती है। उसको सोचना चाहिए कि नौकरशाह उसे उचित सलाह देने के लिए हैं। उनके साथ बेहतर बर्ताव उसकी लोकतांत्रिक कार्यशैली का निदर्शन

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